Munshi Premchand Jayanti : मुंशी प्रेमचंद समाज सुधार और जनजागरण के प्रखर चिंतक थे – जयंत थोरात

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रायगढ़। हिंदी साहित्य के अमर कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद केवल महान साहित्यकार ही नहीं, बल्कि समाज सुधार, जनजागरण और राष्ट्र चेतना के प्रखर चिंतक थे। यह विचार भूतपूर्व डीआईजी एवं वरिष्ठ साहित्यकार जयंत कुमार थोरात ने मुंशी प्रेमचंद की जयंती की पूर्व संध्या पर व्यक्त किए।

संघर्ष ने गढ़ा प्रेमचंद का व्यक्तित्व

जयंत थोरात ने कहा कि 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गांव में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव, जिन्हें दुनिया मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानती है, ने बचपन से ही अभाव और संघर्ष का सामना किया। यही अनुभव उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत बने और उन्होंने समाज की वास्तविक तस्वीर को अपनी कहानियों और उपन्यासों में जीवंत रूप से प्रस्तुत किया।

साहित्य को बनाया जनसेवा का माध्यम

उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर प्रेमचंद ने वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरी छोड़ दी और साहित्य व पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम बनाया। उनकी लेखनी ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक मजबूती प्रदान की और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कालजयी रचनाओं से मिली अमर पहचान

जयंत थोरात ने कहा कि ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’, ‘निर्मला’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे उपन्यास तथा ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘ईदगाह’ और ‘बड़े घर की बेटी’ जैसी कहानियां भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज हैं। प्रेमचंद ने लगभग 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, कई नाटक, अनुवाद और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कर हिंदी साहित्य को अमूल्य धरोहर दी।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासन के दौरान उनकी देशभक्ति से प्रेरित रचनाओं पर प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन उन्होंने कभी अपनी कलम नहीं रोकी। मुंशी प्रेमचंद का साहित्य आज भी समानता, संवेदना और मानवीय मूल्यों का संदेश देता है तथा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

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