गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे साधारण मनुष्य को असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित कर देते हैं
रायगढ़। भारतीय संस्कृति में यदि किसी संबंध को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान प्राप्त है, तो वह है गुरु और शिष्य का पवित्र संबंध। गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण, कृतज्ञता और आत्ममंथन का दिव्य अवसर है। यह वह दिन है जब प्रत्येक शिष्य अपने जीवन की हर उपलब्धि के पीछे खड़े उस महान व्यक्तित्व को नमन करता है, जिसने अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित किया। वास्तव में गुरु वह दिव्य शक्ति हैं, जिनके सानिध्य से जीवन को उद्देश्य, विचारों को दिशा और व्यक्तित्व को पूर्णता प्राप्त होती है।

गुरु गढ़ते नहीं, जीवन को नया जन्म देते हैं
गुरु केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते हैं। वे शिष्य के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें निखारते हैं। जैसे कुशल शिल्पकार एक साधारण पत्थर को देव प्रतिमा बना देता है, वैसे ही गुरु अपने तप, त्याग, अनुशासन और अनुभव से शिष्य के व्यक्तित्व को ऐसा आकार देते हैं कि वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाए। गुरु का प्रत्येक उपदेश जीवन की कठिन राहों में प्रकाश स्तंभ बनकर मार्गदर्शन करता है।

भारत की महान परंपरा गुरु महिमा की साक्षी रही है
हमारे इतिहास और धर्मग्रंथ गुरु की महिमा के अमर उदाहरणों से भरे पड़े हैं। गुरु विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को धर्म, शौर्य और मर्यादा का पाठ पढ़ाया। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को अद्वितीय धनुर्धर बनाया, तो एकलव्य ने गुरु भक्ति के लिए अपना अंगूठा अर्पित कर इतिहास रच दिया। गुरु संदीपनि के सानिध्य में भगवान श्रीकृष्ण ने वह ज्ञान अर्जित किया, जिसने आगे चलकर सम्पूर्ण मानवता को श्रीमद्भगवद्गीता का अमूल्य संदेश दिया। यह परंपरा बताती है कि गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि युग निर्माण करते हैं।
कबीर ने क्यों कहा— गुरु ईश्वर से भी पहले?
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।”
संत कबीर का यह अमर दोहा गुरु की सर्वोच्च महिमा का सजीव प्रमाण है। गुरु ही वह माध्यम हैं, जो मनुष्य को स्वयं से, समाज से और अंततः परमात्मा से जोड़ते हैं। गुरु ज्ञान का वह दीप हैं, जिसकी एक किरण जीवन भर का अंधकार समाप्त कर देती है।
गुरु के आशीर्वाद से ही उड़ान भरते हैं सपने
हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी न किसी गुरु का मौन तप और मार्गदर्शन छिपा होता है। गुरु शिष्य को केवल सफलता प्राप्त करना नहीं सिखाते, बल्कि सफलता को विनम्रता के साथ जीना भी सिखाते हैं। वे संस्कार देते हैं, चरित्र गढ़ते हैं और संघर्षों से लड़ने का आत्मबल प्रदान करते हैं। गुरु का आशीर्वाद ही वह शक्ति है, जो असंभव को भी संभव बना देती है।
“गुरु हैं ज्ञान का सूर्य,
जिनकी किरणों से प्रकाशित होता है जीवन।
गुरु हैं संस्कारों की गंगा,
जिनके सानिध्य से पवित्र होता है मन।”
गुरु पूर्णिमा पर भावभीनी श्रद्धांजलि और कृतज्ञता
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर डॉ. मनीषा त्रिपाठी ने अपने समस्त गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में प्राप्त प्रत्येक उपलब्धि, प्रत्येक संस्कार और प्रत्येक सफलता गुरुजनों के आशीर्वाद का ही प्रतिफल है। उन्होंने कहा कि गुरु का ऋण शब्दों से नहीं चुकाया जा सकता, उसे केवल जीवन में उनके आदर्शों का पालन कर ही उतारा जा सकता है। इस पावन अवसर पर उन्होंने समस्त गुरुजनों को सादर चरण वंदन करते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलमय जीवन की कामना की।
✍️ डॉ. मनीषा त्रिपाठी
प्रधानपाठक
राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित
शासकीय रविशंकर प्राथमिक शाला, चांदमारी, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)




