नई दिल्ली। हिंदू धर्म में चातुर्मास को भक्ति, साधना और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है।
25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास
इस वर्ष चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई 2026 से देवशयनी एकादशी के साथ होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह अवधि लगभग 120 दिनों तक चलेगी और 21 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के दिन इसका समापन होगा। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी।
चातुर्मास में करें ये शुभ कार्य
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी जी की नियमित पूजा करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
- गीता, रामचरितमानस, विष्णु सहस्रनाम और श्रीमद्भागवत का पाठ करें।
- जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दान दें।
- सात्विक भोजन करें और क्रोध, अहंकार व नकारात्मक विचारों से बचें।
- एकादशी व्रत, भजन-कीर्तन और सत्संग में भाग लें।
- तुलसी पौधे की सेवा और पूजा करें।
इन कार्यों से बचने की मान्यता
चातुर्मास के दौरान धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है। इसके अलावा मांस, मदिरा, तंबाकू और अन्य नशीली वस्तुओं के सेवन से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
इस अवधि में झूठ, छल-कपट, विवाद और किसी का अपमान करने से बचने को भी शुभ माना जाता है। साथ ही पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को नुकसान नहीं पहुंचाने की परंपरा है।
आध्यात्मिक साधना का काल
सनातन परंपरा में चातुर्मास को आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना गया है। वर्षा ऋतु में प्राचीन काल से ही संत-महात्मा एक स्थान पर रहकर साधना, प्रवचन और धार्मिक गतिविधियां करते थे। इसी परंपरा ने आगे चलकर चातुर्मास का स्वरूप लिया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान किए गए जप, तप, पूजा और दान-पुण्य का विशेष फल प्राप्त होता है।




