Bastar Goncha Festival : पुरी की तर्ज पर बस्तर में मनाया गया गोंचा पर्व, तुपकी से दी गई भगवान जगन्नाथ को सलामी

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भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों की हुई परिक्रमा, बांस की तुपकी बनी आकर्षण का केंद्र

बस्तर। ओडिशा के पुरी की तर्ज पर हर साल बस्तर में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध गोंचा पर्व इस वर्ष भी श्रद्धा और परंपरा के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों की परिक्रमा कराई गई। बस्तर की रथयात्रा की सबसे खास परंपरा तुपकी से भगवान को सलामी देने की है।

तुपकी से दी जाती है पारंपरिक सलामी

बस्तर के गोंचा पर्व में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के रथ के सामने तुपकी से सलामी देते हैं। तुपकी को बांस से तैयार किया जाता है, जिसमें पेग डाला जाता है। पेग डालने के बाद यह बंदूक की तरह आवाज करती है।

यह अनोखी परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है। वहीं हर वर्ष भगवान जगन्नाथ के लिए नया रथ तैयार किया जाता है।

राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ा है इतिहास

मान्यता के अनुसार, चालुक्य वंश के बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ को सोना और चांदी अर्पित करने के लिए पुरी गए थे। उनके भव्य चढ़ावे से प्रसन्न होकर पुरी के राजा ने जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों के निर्देश पर उन्हें 16 पहियों वाला रथ प्रदान किया था।

बाद में साल और सागौन की लकड़ी से बने इस विशाल रथ को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया। इसके चार पहिए भगवान जगन्नाथ को समर्पित किए गए, जो आगे चलकर बस्तर की रथयात्रा परंपरा का आधार बने।

गोंचा पर्व में दिखती है बस्तर की संस्कृति

बस्तर की रथयात्रा को ही गोंचा पर्व के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में भगवान जगन्नाथ की आराधना के साथ बस्तर की लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।

इतिहास के अनुसार रथ के आठ पहिए दंतेश्वरी देवी को अर्पित किए गए थे। यही परंपरा आज भी बस्तर में आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

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