इन सभी बस्तियों में आज तक पेयजल की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है। स्थिति यह है कि ग्रामीण आज भी पारंपरिक जलस्रोतों-कुएं और झिरिया-पर निर्भर हैं, जो गर्मी के दिनों में सूखने लगते हैं। पानी की कमी का सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है।
उन्हें रोजाना 2 से 5 किलोमीटर तक खड़ी, पथरीली और उबड़-खाबड़ पहाड़ियों से होकर पानी लाना पड़ता है। यह सफर न केवल श्रमसाध्य है, बल्कि कई बार जोखिम भरा भी साबित होता है। बरसात के मौसम में हालात और बिगड़ जाते हैं, जब रास्ते फिसलन भरे हो जाते हैं और जलस्रोत तक पहुंचना कठिन हो जाता है।

कई बार की मांग कोई पहल नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार पंचायत और प्रशासनिक अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के बावजूद इन दुर्गम इलाकों तक सुविधाएं नहीं पहुंच पाई है, जिससे शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि इन गांवों में प्राथमिकता के आधार पर हैंडपंप लगाएं, नल-जल योजना का विस्तार या अन्य वैकल्पिक स्थायी जल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
कुएं से पानी निकलते हुए बैगा परिवार
