नर्सिंग होम एक्ट की सूची ने खोली पोल, वैध लैब सिर्फ 7; बिना पंजीयन चल रहे केंद्रों पर कब होगी कार्रवाई? स्वास्थ्य विभाग का जवाब बाकी
गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था फिर सवालों के घेरे में है। नर्सिंग होम एक्ट के तहत जारी आधिकारिक सूची ने पूरे निगरानी तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सूची के अनुसार जिले में सिर्फ सात पैथोलॉजी लैब ही पंजीकृत और वैध हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर बीस से अधिक जांच केंद्रों के बिना अनुमति संचालित होने की चर्चा है। चिंता की बात यह है कि इनमें से कई केंद्र जिला मुख्यालय गौरेला-पेण्ड्रा के बेहद नजदीक ही खुलेआम चल रहे बताए जा रहे हैं।
वैध लैब कौन सी हैं: आधिकारिक सूची में सिर्फ सात नाम
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी और उपलब्ध सूची के मुताबिक जिले में पंजीकृत सात वैध पैथोलॉजी लैब ये हैं: हेल्थ एंड मेडिसिन लैब, आर.एस. इमेजिंग एंड डायग्नोस्टिक लैब, लव केमिस्ट जायसवाल पैथोलैब, योगेश डायग्नोस्टिक लैब, जायसवाल डायग्नोस्टिक सेंटर, जीपीएम डायग्नोस्टिक लैब और साई डायग्नोस्टिक लैब।
नर्सिंग होम एक्ट के प्रावधानों के अनुसार, बिना पंजीयन और बिना योग्य MD पैथोलॉजिस्ट की निगरानी के किसी भी पैथोलॉजी लैब का संचालन पूरी तरह अवैध और नियमों का उल्लंघन है।
बीस से ज्यादा केंद्रों पर सवाल, गौरेला-पेण्ड्रा में सबसे ज्यादा चर्चा
सात वैध लैब के इतर, स्थानीय स्तर पर कई अन्य केंद्रों के नाम लगातार सामने आ रहे हैं जिनकी वैधता पर सवाल हैं।
गौरेला क्षेत्र में गौरेला पैथो लैब, श्रीराम तहसील, विलियम तहसील, मात्र छाया, गोंडवाना, राठौर और तिवारी नाम से जुड़े संचालन चर्चा में हैं।
पेण्ड्रा क्षेत्र में योगेश डायग्नोस्टिक से जुड़े दो अलग-अलग संचालन और जगदीश साहू द्वारा संचालित नेशनल पैथोलैब को लेकर भी लाइसेंस की स्थिति संदिग्ध बताई जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इन केंद्रों के बोर्ड तो लगे हैं, पर इनके पास वैध पंजीयन और फुल-टाइम पैथोलॉजिस्ट हैं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है।
मुख्य सवाल: जिला मुख्यालय के पास ही चल रहा खेल तो CHMO-नोडल सिस्टम क्या कर रहा था?
सबसे बड़ा और सीधा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर है। जब कथित तौर पर अपंजीकृत पैथोलॉजी का यह पूरा नेटवर्क जिला मुख्यालय के आसपास ही लंबे समय से संचालित था, तो मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और नोडल अधिकारी द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी, या जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंद ली गईं? यही कारण है कि अब मामला सिर्फ संचालन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे निगरानी तंत्र और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पैथोलॉजी रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर इलाज तय करते हैं। ऐसे में गलत या अपंजीकृत लैब की रिपोर्ट हजारों मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है।
विभाग मौन, आरोपों की पुष्टि नहीं
फिलहाल “मिलीभगत” और “संरक्षण” जैसे आरोप केवल स्थानीय चर्चाओं और सोशल मीडिया तक सीमित हैं। इनकी किसी भी जांच एजेंसी या प्रशासन द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
खबर लिखे जाने तक CMHO, GPM की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि संदिग्ध केंद्रों की जांच के लिए कोई टीम गठित हुई है या नहीं, और अपंजीकृत पाए जाने पर कब तक कार्रवाई होगी।
अब सबकी नजर स्वास्थ्य विभाग पर है कि वह वास्तविक जांच कर दोषी केंद्रों को सील करता है या फिर यह मामला भी केवल नोटिस और फाइलों तक ही सीमित रह जाता है
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