टैक्स तो वसूला, सुविधा नदारद: रायगढ़ निगम में गांवों का शोषण या विकास?
रायगढ़@खबर सार :- नगर निगम की सीमा में शामिल किए गए गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के बड़े-बड़े वादे अब हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। वार्ड क्रमांक 41 के छातामुड़ा-सहदेवपाली इलाके में जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। यहां न तो सामुदायिक भवन बना, न ही मुक्तिधाम का अधूरा निर्माण पूरा हुआ। नतीजा? शादी-विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक के लिए स्थानीय निवासियों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव के 10 महीने बीत जाने के बावजूद वार्ड की बुनियादी समस्याओं पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जबकि जनप्रतिनिधि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते।
वार्ड में प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत बने कई मकान आज भी अधर में लटके हैं। दरवाजे-खिड़कियां तक नहीं लगीं, लेकिन कागजों में पूरा भुगतान हो चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्यों में मिलीभगत और लापरवाही बरती गई है। “हमारे पैसे कहां गए? घर तो अधूरे हैं, लेकिन अफसरों की जेबें भर गईं,” एक निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया। यह अनियमितताएं न सिर्फ सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि गरीब परिवारों के सपनों को कुचल रही हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात नगर निगम की आधिकारिक पार्षद सूची से जुड़ी है। वार्ड 41 की आदिवासी महिला पार्षद आशा खड़िया का मोबाइल नंबर सूची में शामिल ही नहीं है। आरोप है कि एक रसूखदार व्यक्ति नवल पटेल ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पार्षद का नंबर दर्ज होने से रोक दिया। सूची में दर्ज नंबर पटेल का ही है, जो खुद को पार्षद से भी ज्यादा ताकतवर बताने से नहीं चूकता। राष्ट्रीय टीवी चैनल व अन्य राष्ट्रीय खबर की टीम जब वार्ड पहुंची और पार्षद से संपर्क करने की कोशिश की, तो फोन पर पटेल ने दबंग अंदाज में बात की। “कौन हो तुम? क्या चाहिए?” – उनका लहजा इतना रौबीला था कि आम नागरिकों की आवाज दबना तय लगता है। इतना ही नहीं, टीम के साथ मौजूद एनडीटीवी और अन्य राष्ट्रीय अखबारों के रिपोर्टर्स को भी गाली-गलौज और धमकी दी गई।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि चुनाव के बाद से पार्षद आशा खड़िया का चेहरा तक नहीं दिखा। “वह कहां हैं? हमारी समस्याएं कौन सुनेगा?” – एक ग्रामीण ने फूटते गुस्से में कहा। पटेल पर आरोप है कि वह चुनाव का खर्च उठाने और वार्ड में ठेके लेने के बदले पार्षद की भूमिका निभा रहे हैं। यह मामला आदिवासी महिला जनप्रतिनिधि की आवाज दबाने और लोकतंत्र को कमजोर करने का संगीन उदाहरण है। क्या नगर निगम में प्रभावशाली लोगों का बोलबाला जारी रहेगा?
नगर निगम में शामिल होने के बाद ग्रामीणों पर टैक्स का बोझ तो बढ़ा, लेकिन बदले में पानी, आवास और सामाजिक ढांचे जैसी सुविधाएं नदारद हैं। टैक्स वसूली ने आम परिवारों की कमर तोड़ दी है। सवाल उठता है – क्या नगर निगम सिर्फ राजस्व जुटाने का माध्यम बनकर रह गया है? या इन गांवों को वाकई विकास का हक मिलेगा? अधिकारियों से संपर्क करने पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। जांच की मांग तेज हो रही है, लेकिन क्या कार्रवाई होगी? यह समय बताएगा।


