कोरबा छात्रावास घोटाला : प्रशासन ने ऐसी की जांच कि अफसरों पर नहीं आई आंच, ठेकेदार और कंप्यूटर ऑपरेटर को बता दिया 3 करोड़ का आरोपी

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कोरबा। आदिवासी विकास विभाग में छात्रावास मरम्मत घोटाले के मामले में कानून के हाथ बड़े और रसूखदार आरोपियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। रसूखदार छुट्टे घूम रहे हैं। लेकिन आदिवासी विकास विभाग इस घोटाले के लिए अपने एक डाटा एंट्री ऑपरेटर और चार ठेकेदारों
को जिम्मेदार मान रहा है।

इस घोटाले में आदिवासी विभाग के तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर, विभाग के सहायक अभियंता अजीत कुमार
तिग्गा, लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर राकेश वर्मा की क्या भूमिका थी। इसे लेकर कुछ बोलने से बच रहे हैं। विभाग की ओर से इन अफसरों के खिलाफ सिर्फ विभागीय जांच के लिए पत्र लिखा गया है। जबकि आदिवासी विकास विभाग ने यह घोटाला उजागर होने के बाद जिला प्रशासन ने जांच कराने का निर्णय लिया था। कलेक्टर के निर्देश पर जांच के लिए समिति का गठन किया गया था।

समिति ने चार ठेकेदार और डाटा एंट्री ऑपरेटर की भूमिका तय ठेकेदा कर दी। लेकिन इस घोटाले में ठेकेदारों की मदद नहीं अफसरों किस-किस स्तर पर की ? यह नहीं बताया ना कि उनके खिलाफ आदिवासी विकास विभाग की ओर से सिविल लाइन थाना में एफआईआर दर्ज कराया गया ।

आदिवासी विकास विभाग की योजनाओं में गड़बड़ी का खेल लंबे समय से चल रहा है। खास करके केंद्र और राज्य सरकारों से प्राप्त होने वाली राशि को लेकर अगस्त के पहले पखवाड़ा में इस गड़बड़ी को लेकर जिन चार ठेकेदारों पर मुकदमा दर्ज किया गया है। उनमें साई ट्रेडर्स पॉलीवाल बुक डिपो, बालाजी मंदिर रोड रामपुर कोरबा, मेसर्स साईं कृपा बिल्डर्स मंगल भवन, बाजार चौक छुरी, मसर्स एसएसए कंस्ट्रक्शन, मेन रोड चैतमा साजा बहरी और मेसर्स बालाजी इंफ्रास्ट्रक्चर वार्ड क्रमांक छह
जायसवाल हाउस राजीव नगर कोरबा शामिल है।

इस कार्य के लिए संबंधित ठेकेदारों को क्रमशः 32 लाख 95 हजार 468 रुपए, 79 लाख एक हजार 719 रुपए, 43 लाख 36 हजार 750 रुपए और एक करोड़ 35 लाख 61 हजार 967 रुपए का भुगतान किया गया। आदिवासी विकास विभाग का आरोप है कि इन ठेकेदारों ने रुपए प्राप्त किया। लेकिन कार्य को पूरा नहीं किया।

इधर इस घोटाले में नामजद आरोपी बनाए गए ठेकेदारों ने
निचली कोर्ट में याचिका लगाकर अग्रिम जमानत की मांग किया। लेकिन कोर्ट ने दो ठेकेदारों के अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। इसके बाद भी पुलिस इस गड़बड़ी से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार करने में ढिलाई बरत रही है। इस बीच आरोपी जमानत लेने के लिए सक्रिय हो गए हैं।

आदिवासी विकास विभाग में हुए इस घोटाले के पैसे कहां गए?
यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन विभाग में चर्चा है कि विभागीय अफसरों ने ठेकेदारों के साथ मिलकर यह गड़बड़ी किया। पुलिस की जांच निष्पक्षता के साथ आगे बढ़ती है तो इस मामले में कई और तथ्य सामने आएंगे। पुलिस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इस घोटाले से जुड़े सबूतों को एकत्र करने की है। जबकि आदिवासी विकास विभाग अपनी शिकायत में पहले ही बता चुका है किं उसके कार्यालय में इस घोटाले से जुड़े टेंडर डॉक्यूमेंट के अलावा सभी दस्तावेज गायब है।

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