केन्द्र सरकार का 2025-26 बजट, स्वास्थ्य पर खर्च नाकाफी, अमृतकाल के बजट में स्वास्थ्य के लिए जीवनामृत का अभाव

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आलेख: जे के कर

केन्द्र सरकार ने 2025-26 का आम बजट प्रस्तुत किया, जिसमें स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सीमित धन आवंटित किया गया है। स्वास्थ्य बजट में 11.10% की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन यह वृद्धि बढ़ती महंगाई और चिकित्सा खर्चों के मुकाबले नाकाफी साबित हो रही है। साल 2024-25 में स्वास्थ्य के लिए 93,471.76 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जबकि 2025-26 में यह बढ़कर 1,03,851.46 करोड़ रुपये हो गया है।

चिकित्सा खर्च में लगातार वृद्धि, बजट पर्याप्त नहीं
चिकित्सा सेवाओं पर बढ़ते खर्च, जैसे दवाओं, उपकरणों, जांचों, सर्जरी और अस्पतालों के खर्चों में लगातार वृद्धि के कारण स्वास्थ्य बजट की बढ़ोतरी को नाकाफी माना जा रहा है। एक उदाहरण के रूप में, सोने की कीमतों में 30.06% का इजाफा हुआ है, जबकि स्वास्थ्य बजट में केवल 11.10% की वृद्धि हुई है।

आर्थिक सर्वे 2024-25: स्वास्थ्य पर जीडीपी का खर्च बढ़ाने की आवश्यकता
आर्थिक सर्वे 2024-25 के अनुसार, 2021-22 में भारत ने स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1.87% खर्च किया था, जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाकर इसे 6% तक पहुंचाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत, 2025 तक स्वास्थ्य पर सरकार के खर्च का लक्ष्य 2.5% था, जो अभी भी बहुत कम है।

छत्तीसगढ़ का उदाहरण: राज्य सरकार की हिस्सेदारी
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य पर खर्च का प्रतिशत 2.9% है, जिसमें से राज्य सरकार ने 52.4% और जनता ने 36.7% खर्च किया। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि राज्य के नागरिकों को अपनी जेब से बड़ी राशि स्वास्थ्य पर खर्च करनी पड़ती है।

भारत का स्वास्थ्य खर्च वैश्विक औसत से काफी कम
भारत का स्वास्थ्य खर्च ‘आर्थिक सहयोग और विकास संगठन’ (OECD) के देशों के औसत 7.6% और BRICS देशों के औसत 3.6% से काफी कम है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर 62% ‘आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर’ है, जो वैश्विक औसत 18% का तीन गुना है।

स्वास्थ्य पर अधिक खर्च से जीवन प्रत्याशा में सुधार
OECD के अध्ययन के अनुसार, स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 1% की वृद्धि से शिशु मृत्यु दर में 0.21% कमी और जीवन प्रत्याशा में 0.008% वृद्धि होती है। भारत में जीवन प्रत्याशा 67.3 वर्ष है, जो कि कई पड़ोसी देशों से कम है।

स्वास्थ्य पर बजट खर्च में कमी, कोविड के बाद कोई सुधार नहीं
भारत में स्वास्थ्य पर बजट खर्च कभी पूरा नहीं किया गया। पिछले वर्षों में कोविड-19 के दौरान कुछ अधिक खर्च किया गया, लेकिन सामान्य स्थिति में बजट के अधिकांश हिस्से का उपयोग नहीं हुआ। इस पर विशेषज्ञों का मानना है कि जन स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं है।

नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज़ (NCDs) पर बढ़ता खर्च
भारत में मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संचारी बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिसके इलाज के लिए भारी खर्च हो रहा है। यह स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की आवश्यकता को और बढ़ाता है।

स्वास्थ्य एक बिकाऊ वस्तु बन गई है, जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें
अंत में, लेख में यह कहा गया है कि स्वास्थ्य को एक बिकाऊ वस्तु बना दिया गया है, और इसे आम जनता के बजट में प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। स्वास्थ्य को चुनावी मुद्दा भी नहीं बनाया जाता है, जिसके कारण आम जनता को भारी चिकित्सा खर्च का सामना करना पड़ता है।

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