“कागजों में मजदूर, जमीन पर सन्नाटा”: पसान वन परिक्षेत्र में लाखों की मजदूरी घोटाले का आरोप, वन विभाग कटघरे में

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दस्तावेजों और स्थानीय दावों ने उठाए गंभीर सवाल, डिप्टी रेंजर अयोध्या प्रसाद सोनी की भूमिका पर चर्चा तेज

Korba जिले के पसान वन परिक्षेत्र से सामने आए दस्तावेज और स्थानीय स्तर पर उठ रहे आरोप अब एक बड़े वित्तीय घोटाले की ओर इशारा कर रहे हैं। आरोप है कि वन विभाग की विभिन्न योजनाओं के नाम पर मजदूरों की लंबी सूची तैयार कर कागजों में भारी मजदूरी भुगतान दर्शाया गया, जबकि जिन लोगों के नाम दर्ज किए गए, उन्होंने कथित तौर पर कभी काम किया ही नहीं। इस पूरे मामले ने अब प्रशासनिक स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पौधारोपण और स्टॉपडेम जैसी योजनाओं के नाम पर दिखाया गया भुगतान

सूत्रों के अनुसार पौधारोपण, नर्सरी निर्माण, स्टॉपडेम निर्माण और सिंचित प्लांटेशन जैसे कार्यों के तहत बड़ी मात्रा में मजदूरी भुगतान दर्ज किया गया। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन स्थानों पर भारी मजदूरी दर्शाई गई है, वहां उतने स्तर का काम कभी दिखाई नहीं दिया। इससे यह आशंका और गहरा गई है कि कागजों में काम दिखाकर सरकारी धन निकाले जाने का खेल हुआ है।

₹22,365 की एक जैसी रकम ने बढ़ाई शंका, कई नामों पर उठे सवाल

मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि कुछ मजदूरों के नाम के सामने ₹22,365 की एक जैसी राशि दर्ज बताई जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज संयोग है या फिर तयशुदा रकम के जरिए भुगतान दिखाने का कोई पैटर्न। स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि फर्जी भुगतान कर राशि निकालने के बाद उसे नकद में वापस लेकर कुछ हिस्सा संबंधित लोगों को दे दिया जाता था।

जिन नामों पर दिखाया गया भुगतान, उनमें कई ग्रामीणों ने काम से किया इनकार

सूत्रों के अनुसार जिन लोगों के नाम से भुगतान दर्शाया गया, उनमें धरमलाल/जवाहर (ग्राम तेंदूटिकरा), उर्मिला/बृज कुमार (ग्राम सेमरहा), ललिता/बुधमान (ग्राम सेमरहा), मानसिंह/रायसिंह (ग्राम सेमरहा), वृंदा बाई/मानसिंह (ग्राम सेमरहा), पिंकी/बेचुराम (ग्राम तनेरा), बुधमान/शिवप्रसाद (ग्राम सेमरहा), भगवान/गंगासिंह (ग्राम बीजाडांड), अमर सिंह/बबुआ सिंह (ग्राम बीजाडांड), कन्हैया लाल/रायसिंह (ग्राम सूखा डांड), रामप्रसाद (ग्राम सीपत पारा), मोहित राम (ग्राम जल्के) और प्रमोद कुमार राजवाड़े (ग्राम पलामू) शामिल बताए जा रहे हैं। आरोप है कि इनमें से कई लोगों ने संबंधित कार्यों में कभी मजदूरी नहीं की।

स्थानीय स्तर पर ‘सिंडिकेट’ की चर्चा, जांच की मांग तेज

स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि यह पूरा मामला एक सुनियोजित नेटवर्क के जरिए अंजाम दिया गया हो सकता है। मस्टर रोल तैयार करना, उपस्थिति दर्ज करना, भुगतान स्वीकृत कराना और राशि निकालना—इन सभी प्रक्रियाओं में कथित तौर पर एक ही समूह का प्रभाव बताया जा रहा है। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला विभागीय लापरवाही से आगे बढ़कर संगठित भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ सकता है।

भौतिक सत्यापन और निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि जिन स्थानों पर भारी मजदूरी का भुगतान दिखाया गया है, वहां मौके पर अपेक्षित स्तर का कार्य नजर नहीं आता। ऐसे में कई सवाल सामने आ रहे हैं—क्या इन कार्यों का भौतिक सत्यापन किया गया था? क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थल निरीक्षण किया? क्या मजदूरी की राशि वास्तव में श्रमिकों के बैंक खातों में गई? यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी है?

स्वतंत्र जांच की मांग, विभाग की चुप्पी से बढ़ा संदेह

यह मामला सीधे डिप्टी रेंजर अयोध्या प्रसाद सोनी के कार्यक्षेत्र से जुड़ा बताया जा रहा है। हालांकि अभी तक उनकी ओर से या Chhattisgarh Forest Department की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में अब इस पूरे प्रकरण की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय लोग चाहते हैं कि जांच Lokayukta Chhattisgarh या Economic Offences Wing Chhattisgarh को सौंपी जाए, ताकि दस्तावेजों, बैंक लेनदेन, मस्टर रोल और स्थल निरीक्षण का मिलान कर सच्चाई सामने लाई जा सके।

प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा सवाल

वन विभाग जैसी महत्वपूर्ण संस्था की योजनाओं में यदि इस प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो यह केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता से भी जुड़ा विषय बन जाता है। जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक पसान वन परिक्षेत्र का यह मामला जिले में प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।

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