मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना क्यों मुश्किल? जानिए संविधान में क्या है प्रावधान और कैसे होती है प्रक्रिया

CEC को सरकार सीधे नहीं हटा सकती, सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है

नई दिल्ली। भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संवैधानिक रूप से काफी मजबूत माना जाता है। सरकार अपनी इच्छा से मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे पद से नहीं हटा सकती। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।

इस प्रावधान का उद्देश्य चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बनाए रखना है। निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन के लिए संवैधानिक संस्था है।

आज तक किसी CEC को पद से नहीं हटाया गया

स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद की इस विशेष प्रक्रिया के जरिए पद से हटाया नहीं गया है। हालांकि, अतीत में चुनाव आयुक्तों को हटाने को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर प्रयास जरूर हुए हैं।

1992 में टीएन शेषन को हटाने की मांग

1992 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को पद से हटाने की मांग को लेकर वामपंथी दलों की ओर से प्रयास किए गए थे। हालांकि यह प्रक्रिया संसद में आवश्यक समर्थन के अभाव में आगे नहीं बढ़ सकी।

2006 में नवीन चावला को हटाने की मांग

मार्च 2006 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग को लेकर एनडीए की ओर से राष्ट्रपति के समक्ष याचिका दी गई थी।

2009 में CEC ने की थी सिफारिश

2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी। गोपालस्वामी ने उनके खिलाफ कथित राजनीतिक पक्षपात से जुड़े आरोपों का हवाला दिया था। तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया।

संविधान में क्या है CEC को हटाने का प्रावधान?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए अनुच्छेद 324(5) लागू होता है। इसमें कहा गया है कि CEC को उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 124(4) में दी गई है। इसमें संसद के दोनों सदनों की विशेष बहुमत वाली प्रक्रिया और राष्ट्रपति के आदेश की आवश्यकता होती है।

CEC को हटाने की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है?

इस प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं।

पहला चरण: संसद में नोटिस

हटाने के प्रस्ताव के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस आवश्यक होता है। Judges (Inquiry) Act के तहत सभापति या स्पीकर नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।

दूसरा चरण: जांच समिति

नोटिस स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यों वाली जांच समिति गठित की जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को शामिल किया जाता है।

तीसरा चरण: आरोपों की जांच

समिति लगाए गए आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट संसद के संबंधित पीठासीन अधिकारी को सौंपती है।

चौथा चरण: संसद में विशेष बहुमत

यदि जांच में दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित होने की बात सामने आती है, तो हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में विचार के लिए जाता है। इसे पारित करने के लिए संविधान में निर्धारित विशेष बहुमत जरूरी होता है।

पांचवां चरण: राष्ट्रपति का आदेश

दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति के आदेश से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है।

सरकार सीधे CEC को क्यों नहीं हटा सकती?

मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को सामान्य सरकारी नियुक्ति की तरह नहीं माना गया है। राष्ट्रपति CEC की नियुक्ति करते हैं और उनका कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, निर्धारित है। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान तरीके और आधार पर ही हटाया जा सकता है।

यही संवैधानिक सुरक्षा चुनाव आयोग को कार्यपालिका के सीधे दबाव से अलग रखने के उद्देश्य से बनाई गई है।

संसद का संख्याबल कितना महत्वपूर्ण?

CEC को हटाने की प्रक्रिया में केवल प्रस्ताव लाना पर्याप्त नहीं है। अंतिम रूप से दोनों सदनों में संविधान के मुताबिक विशेष बहुमत हासिल करना जरूरी होता है। इसलिए किसी भी दल या गठबंधन के लिए केवल साधारण बहुमत के आधार पर CEC को हटाना संभव नहीं है।

हालांकि, संसद में किसी समय मौजूद दलों की संख्या और गठबंधन की स्थिति बदल सकती है। इसलिए किसी विशेष समय के संख्याबल के आधार पर इसे स्थायी रूप से “असंभव” कहना उचित नहीं होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि CEC को हटाने के लिए संवैधानिक रूप से निर्धारित कड़े मानदंड और विशेष संसदीय बहुमत की आवश्यकता होती है।

Share This Article