‘मंजिल से ज्यादा जरूरी है सही रास्ता’—डॉ. ललित माखीजा

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बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ में जीवन के अनुभवों पर खुलकर बोले डॉ. माखीजा, पत्रकारों के लिए ओपीडी शुल्क माफ करने की घोषणा

बिलासपुर। जिंदगी में मंजिल तय करना आसान है, लेकिन उस मंजिल तक पहुंचने के दौरान परिस्थितियों के अनुसार रास्ता बदल पाना ही असली समझदारी है। विश्व हिंदू परिषद छत्तीसगढ़ के प्रदेशाध्यक्ष और नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. ललित माखीजा ने शनिवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए यह बात कही।

संघर्ष से ज्यादा परिस्थितियों को समझने पर दिया जोर

डॉ. माखीजा ने अपने बचपन से लेकर डॉक्टर बनने तक के सफर, चिकित्सा सेवा, सामाजिक जीवन और संगठनात्मक जिम्मेदारियों से जुड़े अनुभव पत्रकारों के साथ साझा किए। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी किसी पद या उपलब्धि को जीवन की अंतिम मंजिल नहीं माना। सामने आया दायित्व ही उस समय उनकी प्राथमिकता रहा और उसे पूरी क्षमता से निभाना ही उनका उद्देश्य रहा।

बड़े परिवार में पले, खुद बनाई अपनी राह

अपने बचपन को याद करते हुए डॉ. माखीजा ने बताया कि उनका परिवार बड़ा था। पिता के पांच छोटे भाई और छह बहनें थीं और परिवार में पढ़ाई की दिशा में आगे बढ़ने वाले वे पहले लड़के थे। उड़िया रेलवे क्षेत्र मिडिल स्कूल से आठवीं तक शिक्षा लेने के बाद उन्होंने गुरुनानक स्कूल और भारतमाता स्कूल में पढ़ाई की।

उन्होंने बताया कि आर्थिक संघर्ष तो नहीं था, लेकिन सही दिशा दिखाने वाला कोई विशेष मार्गदर्शक भी नहीं था। परिवार की किराना दुकान में हाथ बंटाते हुए उन्होंने समाज के अलग-अलग लोगों को करीब से देखा, जिनसे उन्हें जीवन को समझने में मदद मिली।

इंजीनियरिंग की राह छूटी, मेडिकल कॉलेज का खुला रास्ता

डॉक्टर बनने की कहानी बताते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआत में उनका रुझान इंजीनियरिंग की ओर था। मित्र डॉ. श्रीकांत गिरी के साथ पॉलिटेक्निक में चयन भी हुआ, लेकिन शिक्षक देवेंद्र शेमानी की सलाह पर उन्होंने 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की तैयारी का निर्णय लिया।

बाद में बायोलॉजी विषय लेने के बाद परिस्थितियां बदलीं और उन्होंने पीएमटी की तैयारी शुरू की। मेहनत के दम पर अच्छी रैंक हासिल कर रायपुर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। हिंदी माध्यम से आने के कारण मेडिकल की अंग्रेजी पढ़ाई शुरुआत में चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे खुद को उस माहौल के अनुरूप ढाल लिया।

‘कमी वहीं दिखाई देती है, जहां तुलना शुरू होती है’

जीवन में संतोष के सवाल पर डॉ. माखीजा ने कहा कि व्यक्ति की परेशानी कई बार जरूरतों से ज्यादा दूसरों से तुलना करने की वजह से बढ़ती है। किसी दूसरे की गाड़ी, घर या जीवनशैली देखकर अपने जीवन में कमी महसूस होने लगती है।

उन्होंने बताया कि उनकी पहली गाड़ी भी सेकंड हैंड थी। जरूरत के अनुसार उन्होंने चीजें अपनाईं, लेकिन उन्हें कभी जीवन की अंतिम उपलब्धि नहीं माना।

‘सीधी राह चलिए, जरूरत पड़े तो मोड़ लीजिए’

डॉ. माखीजा ने जीवन को दो बिंदुओं के बीच की सीधी रेखा से जोड़ते हुए कहा कि जीवन हमेशा गणित की तरह नहीं चलता। उन्होंने अपने अंदाज में कहा—“In life, go straight and turn right.”

उनका कहना था कि दिशा सही होनी चाहिए, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर सही समय पर रास्ता बदलने में संकोच नहीं करना चाहिए। लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी है, लेकिन लक्ष्य को जिद बना लेना व्यक्ति के विकास में बाधा बन सकता है।

जिम्मेदारी मिली तो पीछे नहीं हटे

संगठनात्मक जीवन की चर्चा में डॉ. माखीजा ने कहा कि उन्होंने कभी किसी पद के लिए प्रयास नहीं किया। उनके अनुसार काम करने के लिए पद की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने भाजपा में अपने पुराने संगठनात्मक अनुभवों और विभिन्न राज्यों में मिली जिम्मेदारियों का भी उल्लेख किया।

बाद में वरिष्ठों के आग्रह और मार्गदर्शन पर विश्व हिंदू परिषद में जिम्मेदारी स्वीकार की। उन्होंने कहा कि उनका सिद्धांत हमेशा यही रहा है कि जहां जिम्मेदारी मिले, वहां पूरी ईमानदारी और क्षमता के साथ काम किया जाए।

लक्ष्य आपका, परिणाम पूरी तरह आपके हाथ में नहीं

डॉ. माखीजा ने लक्ष्य और परिणाम को लेकर कहा कि लक्ष्य बनाना जरूरी है, लेकिन परिणाम को पूरी तरह अपने नियंत्रण में मान लेना उचित नहीं। विद्यार्थी के हाथ में पढ़ाई और मेहनत है, लेकिन अंतिम परिणाम उसके हाथ में नहीं होता।

इसी तरह चिकित्सा क्षेत्र में भी उनका लक्ष्य केवल बड़ा संस्थान खड़ा करना या अधिक कमाई करना नहीं रहा, बल्कि बेहतर नेत्र चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना रहा।

समाज को जागरूक करने पर दिया जोर

विश्व हिंदू परिषद की भूमिका पर उन्होंने कहा कि सामाजिक कार्य केवल किसी संगठन के कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को जागरूक, संस्कारित, समरस और सेवाभावी बनाने में हर व्यक्ति की भूमिका है। उन्होंने समाज को अपने मूल्यों और परंपराओं को समझने तथा परिस्थितियों के प्रति जागरूक रहने की जरूरत पर जोर दिया।

पत्रकारों के लिए ओपीडी शुल्क माफ करने की घोषणा

कार्यक्रम के दौरान डॉ. ललित माखीजा ने बिलासपुर प्रेस क्लब के पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि प्रेस क्लब सदस्यों की ओपीडी फीस निःशुल्क की जाएगी। उन्होंने बताया कि प्रेस क्लब अध्यक्ष के लेटरपैड अथवा अधिकृत अनुरोध के आधार पर पत्रकारों को यह सुविधा मिलेगी।

जरूरत पड़ने पर अध्यक्ष के अनुरोध पर उपचार के मामले में भी हरसंभव सहयोग करने की बात उन्होंने कही। इस घोषणा का प्रेस क्लब ने स्वागत करते हुए डॉ. माखीजा के प्रति आभार जताया।

‘हमर पहुना’ में साझा किए जीवन के अनुभव

कार्यक्रम में पत्रकारों ने डॉ. माखीजा से उनके निजी जीवन, चिकित्सा सेवा, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और सामाजिक विषयों से जुड़े सवाल किए। उन्होंने भी सहजता से अपने अनुभव साझा किए।

कार्यक्रम का मुख्य संदेश यही रहा कि मंजिल तय करना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है सही दिशा में आगे बढ़ना और परिस्थितियों के अनुसार रास्ता बदलने की क्षमता बनाए रखना।

अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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