वंदेमातरम पर सियासी संग्राम: क्या देशभक्ति तय करेगी सरकार या संविधान?

By
Advertisement
Advertisement

“वंदेमातरम” को लेकर नई बहस के बीच भाजपा-आरएसएस की राजनीति पर तीखा हमला

भारत में “वंदेमातरम” को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज हो गई है। अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़े छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष संजय पराते ने अपने आलेख में केंद्र सरकार और भाजपा-आरएसएस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि “वंदेमातरम” को देशभक्ति की कसौटी बनाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की जा रही है।

उन्होंने लिखा कि आजादी के आंदोलन में “वंदेमातरम” स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा मंत्र था, लेकिन उस दौर में भी इसे किसी की देशभक्ति मापने का आधार नहीं बनाया गया। उनका आरोप है कि आज वही संगठन, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, अब “वंदेमातरम” के नाम पर राष्ट्रवाद की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

राष्ट्रगान बनाम राष्ट्रगीत की बहस को बताया कृत्रिम विवाद

लेख में कहा गया है कि “जन-गण-मन” और “वंदेमातरम” के बीच श्रेष्ठता की बहस ऐतिहासिक रूप से कभी नहीं रही। संविधान लागू होने के बाद “जन-गण-मन” को राष्ट्रगान और “वंदेमातरम” को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था, जिसे देश ने सहज रूप से स्वीकार किया।

संजय पराते ने आरोप लगाया कि भाजपा “जन-गण-मन” की धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी सोच के मुकाबले “वंदेमातरम” को सांप्रदायिक राजनीति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा “वंदेमातरम” को लेकर बनाए जा रहे नियम और अनिवार्यता की चर्चा संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

“देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का अधिकार किसे?”

आलेख में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या किसी सरकार को नागरिकों की देशभक्ति तय करने का अधिकार है? लेखक के अनुसार यदि “वंदेमातरम” को अनिवार्य बनाया जाता है और उसका पालन नहीं करने पर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाते हैं, तो यह संविधान विरोधी कदम माना जाएगा।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से गीत के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताता रहा है और ऐसे में इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उभारना समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

भाजपा-आरएसएस पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप

संजय पराते ने अपने लेख में भाजपा-आरएसएस पर आरोप लगाया कि राष्ट्रवाद के नाम पर वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान भटकाया जा रहा है। उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधनों और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार राष्ट्रवाद की भावनात्मक राजनीति के जरिए जनता का ध्यान मूल सवालों से हटाना चाहती है।

उन्होंने मणिपुर और पश्चिम बंगाल की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि देश सामाजिक तनाव और राजनीतिक हिंसा से जूझ रहा है, लेकिन सरकार “वंदेमातरम” जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाकर नया विवाद खड़ा कर रही है।

संविधान और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी उठे सवाल

लेख में यह भी कहा गया कि यदि केंद्र सरकार “वंदेमातरम” को लेकर कठोर अनिवार्यता लागू करती है, तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। लेखक ने उम्मीद जताई कि न्यायपालिका संविधान की मूल भावना और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करेगी।

अंत में लेखक ने सवाल उठाया कि क्या लोकतांत्रिक भारत में किसी नागरिक की देशभक्ति तय करने का अधिकार किसी राजनीतिक संगठन या सरकार को दिया जा सकता है, या फिर यह अधिकार केवल संविधान और नागरिकों की स्वतंत्र चेतना के पास होना चाहिए।

Advertisement
Share This Article