निजी अस्पतालों से जुड़े पांच मामलों ने खड़े किए सवाल, जांच की धीमी रफ्तार और कार्रवाई को लेकर उठ रही आवाजें
बिलासपुर। न्यायधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल सामने आए हैं। निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान कथित अनियमितताओं, भारी-भरकम बिल, शव सौंपने में विवाद और उपचार में लापरवाही के आरोपों से जुड़े कई मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
एक ओर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और पारदर्शी व्यवस्था का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतों के निस्तारण में देरी के आरोप व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
इन मामलों में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है। हालांकि, शिकायतों और उठ रहे सवालों को देखते हुए यह जरूर महत्वपूर्ण हो गया है कि स्वास्थ्य विभाग जांच की स्थिति और कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे।
18 घंटे के इलाज के बाद 4.60 लाख का बिल, सवालों के घेरे में अस्पताल
व्यापार विहार स्थित एलाइट हॉस्पिटल से जुड़े मामले में परिजनों ने आरोप लगाया कि हार्ट अटैक के मरीज की इलाज के दौरान मौत हो गई और करीब 18 घंटे के उपचार के बाद उन्हें लगभग 4.60 लाख रुपये का बिल थमा दिया गया।
मामला सामने आने के बाद बिल को लेकर विवाद बढ़ा। आरोप है कि बातचीत के बाद बिल की राशि में बड़ी कटौती की गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि शुरुआती बिल इतना अधिक क्यों था और उसमें किन-किन सेवाओं एवं उपचार मदों को शामिल किया गया था।
शिकायत पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से क्या कार्रवाई हुई, इसे लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने आने की जरूरत है।
मृत आदिवासी महिला के शव को रोकने के आरोप से मचा था हड़कंप
तोरवा क्षेत्र के हरिओम हॉस्पिटल से जुड़ा मामला इससे भी अधिक संवेदनशील है। आरोप लगाया गया कि इलाज का भुगतान पूरा नहीं होने के कारण मृत आदिवासी महिला का शव परिजनों को सौंपने में विवाद हुआ।
मामले ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी तूल पकड़ा था। बाद में हस्तक्षेप के बाद शव परिजनों को सौंपे जाने की बात सामने आई।
घटना के बाद विभागीय जांच की बात कही गई थी। अब सवाल यह है कि जांच किस निष्कर्ष पर पहुंची और संबंधित अस्पताल के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
पेंडलवार नर्सिंग होम पर ऑपरेशन के दौरान शरीर में धागा छोड़ने का आरोप
पेंडलवार नर्सिंग होम से जुड़े मामले में प्रसव के दौरान महिला के शरीर में धागा छोड़े जाने का आरोप लगाया गया। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद मरीज को आगे के उपचार के लिए अपोलो अस्पताल ले जाने की बात सामने आई।
मामले में विभागीय जांच के दौरान चिकित्सकीय उपचार से जुड़े अलग-अलग तथ्यों की समीक्षा की गई। वहीं परिजनों की ओर से उपचार में लापरवाही का आरोप लगाया गया।
ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल चिकित्सकीय रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, जांच रिपोर्ट और विशेषज्ञ राय के आधार पर स्पष्ट निष्कर्ष तक पहुंचना है।
जिला अस्पताल में प्रसूता की तबीयत बिगड़ने के मामले ने भी उठाए सवाल
तखतपुर की प्रसूता ज्योति देवांगन के उपचार से जुड़ा मामला भी प्रशासन तक पहुंचा। परिजनों की शिकायत के बाद कलेक्टर स्तर से जांच के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई।
परिजनों का आरोप है कि उपचार के बाद महिला की स्थिति बिगड़ी और संक्रमण को लेकर भी सवाल उठे। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग की ओर से संक्रमण के कारणों और अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकीय संसाधनों से जुड़े तर्क सामने आने की बात कही गई।
मामले में कलेक्टर के निर्देश के बाद जांच की वास्तविक स्थिति और निष्कर्ष सार्वजनिक होना जरूरी है, ताकि आरोप और विभागीय पक्ष दोनों स्पष्ट हो सकें।
नोबल हॉस्पिटल से जुड़े मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार
नोबल हॉस्पिटल से जुड़े उपचार के दौरान मौत के मामले में भी कार्रवाई की प्रक्रिया पोस्टमार्टम रिपोर्ट से जुड़ी होने की बात सामने आई है।
यदि जांच किसी रिपोर्ट के अभाव में लंबित है तो संबंधित रिपोर्ट कब तक उपलब्ध होगी और उसके बाद विभाग क्या कदम उठाएगा, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है।
पांच मामलों ने एक साथ खड़े किए बड़े सवाल
इन अलग-अलग मामलों को जोड़कर देखें तो बिलासपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े होते हैं—
- निजी अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था की निगरानी कितनी प्रभावी है?
- मरीज या उसके परिजनों की शिकायत पर कार्रवाई की समयसीमा क्या है?
- गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच कौन और किस प्रक्रिया से करता है?
- जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती?
- जिला प्रशासन द्वारा दिए गए जांच निर्देशों की निगरानी कौन करता है?
- नर्सिंग होम एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होने पर कितनी कार्रवाई हुई है?
स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन से जवाब की अपेक्षा
इन मामलों को लेकर स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित अस्पताल प्रबंधन का विस्तृत पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है। किसी भी अस्पताल या चिकित्सक को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच भी उतनी ही आवश्यक है।
यदि जांच में लापरवाही या नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो संबंधित पक्ष को भी स्पष्ट रूप से क्लीन चिट दिए जाने की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
जनता चाहती है जांच नहीं, नतीजा
बिलासपुर की जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिकायतों और जांच के बाद परिणाम कब सामने आएंगे। स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था में केवल जांच समिति गठित करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। मरीज और उनके परिजन यह जानना चाहते हैं कि गलती हुई तो जिम्मेदार कौन है और कार्रवाई क्या हुई।
स्वास्थ्य विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही ही इन मामलों से उठ रहे सवालों का वास्तविक जवाब दे सकती है। अब निगाहें जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर छत्तीसगढ़


