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अभिषेक कुमार पाण्डेय@बिलासपुर | विशेष खोजी रिपोर्ट
आसमान से उपग्रह (GIS) की नज़र ने नगर निगम के उस बहीखाते की पोल खोलकर रख दी है, जिस पर लंबे समय से ‘सब चंगा सी’ का पर्दा पड़ा था। शहर की ज़मीन पर कंक्रीट का जंगल उगता गया, मल्टीस्टोरी मकान और चमचमाती दुकानें तनती गईं, लेकिन निगम के बाबूओं के रजिस्टर वहीं के वहीं ठहरे रहे।
ताज़ा डिजिटल मैपिंग और हाउस लिस्टिंग का आंकड़ा किसी घोटाले से कम नहीं है—कागज़ों में 1.27 लाख संपत्तियां और हकीकत में 1.60 लाख! यानी पूरे 33 हजार मकान-दुकान सिस्टम की नज़रों से ‘अदृश्य’ हैं। सरकारी दफ्तरों को अलग भी कर दें, तो कम से कम 25 हजार ऐसी निजी संपत्तियां हैं जो म्युनिसिपल सुविधाओं का पूरा उपभोग कर रही हैं, लेकिन टैक्स के नाम पर निगम की तिजोरी में ‘शून्य’ रुपया जमा कर रही हैं।

- ईमानदार करदाता पर चाबुक, ‘अदृश्य’ संपत्तियों को खुली छूट
शहर में रहने वाले आम मध्यमवर्गीय परिवार पर नल टैक्स, सफाई टैक्स और प्रॉपर्टी टैक्स की एक-एक पाई का हिसाब रखने वाला निगम इस सवाल का क्या जवाब देगा कि 25 हजार संपत्तियों से हर साल उड़ रहा ₹6 करोड़ का टैक्स किसकी जेब में जा रहा है?
निगम का सालाना राजस्व लक्ष्य 126 करोड़ था। अगर महज़ इन्हीं छूटी हुई संपत्तियों को खाते में जोड़ लिया जाता, तो बिना जनता पर एक भी नया सेस या टैक्स लादे खजाने में 132 करोड़ से अधिक बरस रहे होते। विडंबना यह है कि सिस्टम हर बजट में नए कर लगाने के बहाने ढूंढता है, जबकि अपनी ही चौखट पर पड़ा अरबों का राजस्व समेटने से कतराता है। - मोपका से उसलापुर: ‘बिना नक्शे’ की समानांतर नगरी
शहर का सीमा विस्तार हुआ, मोपका, बहतराई, बिजौर, बिरकोना रोड, देवरीखुर्द और घुरू-अमेरी से उसलापुर तक नई कॉलोनियां कट गईं।
- नक्शा पास नहीं, पर बिल्डिंग तैयार: सैकड़ों ऐसे निर्माण खड़े हो गए जिनके पास न तो बिल्डिंग परमिशन है और न ही निगम की मंज़ूरी।
- सुविधाएं पूरी, देनदारी शून्य: इन अवैध व गैर-रिकॉर्डेड बस्तियों तक निगम की सड़कें, कचरा गाड़ियां और स्ट्रीट लाइटें पहुंच रही हैं, लेकिन टैक्स डेटाबेस में इनका कोई वजूद नहीं।
- अंधेरगर्दी की रफ्तार: शहर में हर साल 4 से 5 हजार नए निर्माण जुड़ रहे हैं, लेकिन निगम के सॉफ्टवेयर में एंट्री की रफ्तार कछुए से भी बदतर है।
- ‘सर्वे हो गया, अब ज़ोन अफसर सुधारेंगे’—टालमटोल कब तक?
निगम के आला अधिकारियों का रटा-रटाया बयान है कि “ज़ोन स्तर पर सर्वे कराकर डेटा अपडेट किया जा रहा है।” लेकिन सवाल प्रक्रिया का नहीं, मिलीभगत और इच्छाशक्ति का है:
- जब बिना परमिशन नींव खुद रही थी, तब ज़ोनल अमला और बिल्डिंग इंस्पेक्टर क्या कर रहे थे?
- क्या सैटेलाइट के पकड़ने से पहले फील्ड पर तैनात अमले को 25 हजार नए मकान दिखाई नहीं दिए?
- क्या छूटे हुए इन सभी वर्षों का टैक्स बकाया (Arrears) पेनल्टी समेत वसूला जाएगा, या फाइलों को दबाकर फिर कोई ‘समाधान योजना’ का झुनझुना थमा दिया जाएगा?
शहर केवल ईंट-गारे से नहीं, जवाबदेह व्यवस्था से चलता है। अगर हाई-टेक जीआईएस सर्वे के बाद भी 6 करोड़ की सेंधमारी नहीं रुकी, तो साफ है कि खामी तकनीक में नहीं, नीयत में है।


