RTI Act : झूठी और भ्रामक सूचना पर जवाबदेही से ही सार्थक होगा सूचना का अधिकार — अधिवक्ता डी.पी. जोशी

Advertisement
Advertisement

रायगढ़। अधिवक्ता डी.पी. जोशी ने कहा है कि सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 तभी अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर सकता है, जब जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना देने वाले लोक सूचना अधिकारियों (PIO) की जवाबदेही तय हो। उनका कहना है कि पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही और प्रमाणिक सूचना है, जबकि भ्रामक जानकारी लोकतंत्र और विधि के शासन पर जनता के विश्वास को कमजोर करती है।

RTI का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही

डी.पी. जोशी ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम केवल सूचना प्राप्त करने का कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसका उद्देश्य नागरिकों को सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक कार्यवाहियों से जुड़ी प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराना है।

PIO की जिम्मेदारी

उन्होंने कहा कि लोक सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी केवल सूचना भेजना नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सही, पूर्ण और समयबद्ध जानकारी उपलब्ध कराना है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देता है, रिकॉर्ड छिपाता है या सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करता है, तो यह नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

धारा 20 में दंड का प्रावधान

उन्होंने बताया कि RTI अधिनियम की धारा 20(1) के तहत दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। वहीं धारा 20(2) के तहत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक त्रुटि दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है जब यह सिद्ध हो कि अधिकारी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से या रिकॉर्ड के विपरीत जानबूझकर गलत सूचना दी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख

अधिवक्ता जोशी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी सूचना के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना है। उन्होंने State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (1975), S.P. Gupta v. Union of India (1981), CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011) तथा Manohar v. State of Maharashtra (2012) जैसे प्रमुख निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय ने पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना आयोगों की प्रभावी भूमिका पर बल दिया है।

नागरिकों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी

उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनहित और पारदर्शिता का संवैधानिक साधन है। यदि किसी नागरिक को प्राप्त सूचना गलत या भ्रामक लगती है, तो उसे उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम अपील, द्वितीय अपील या सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए।

सही सूचना से ही मजबूत होगा लोकतंत्र

डी.पी. जोशी ने कहा कि ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोक सूचना अधिकारियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध RTI अधिनियम की धारा 20 के प्रावधानों का निष्पक्ष और प्रभावी उपयोग होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यही सुशासन, पारदर्शिता और लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक आधार है।

Advertisement
Share This Article