रायगढ़। जिले के लैलूंगा क्षेत्र में इन दिनों लाल ईंट का कारोबार तेजी से फैल रहा है। गांव-गांव और खेत-खलिहानों के किनारे ईंट भट्टों की कतारें लग गई हैं। दिन-रात धुआं उगलते ये भट्टे न केवल पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं, बल्कि जंगलों की हरियाली पर भी गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि ईंट पकाने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों से लकड़ियां काटी जा रही हैं। हरे-भरे पेड़ों को रातों-रात काटकर ट्रैक्टरों में भरकर भट्टों तक पहुंचाया जा रहा है। वन संपदा की इस खुली कटाई पर वन विभाग की चुप्पी सवालों के घेरे में है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं है या फिर सब कुछ जानकर भी अनदेखी की जा रही है?
राजस्व विभाग की भूमिका पर भी सवाल
मामले में केवल वन विभाग ही नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कई स्थानों पर बिना वैध अनुमति के ईंट भट्टे संचालित होने की बात सामने आ रही है। भूमि उपयोग परिवर्तन, पर्यावरणीय स्वीकृति और खनन नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं, यह जांच का विषय है।
स्वास्थ्य और खेती पर असर
ग्रामीणों का कहना है कि भट्टों से निकलने वाला काला धुआं आसपास की बस्तियों और खेतों तक पहुंच रहा है। इससे फसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और बच्चों व बुजुर्गों में सांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम अनदेखी के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
भविष्य में गंभीर संकट की आशंका
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अवैध भट्टों का संचालन इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में भू-क्षरण, जल संकट और वन्यजीवों के पलायन जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।
एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण की बात करती है, वहीं जमीनी स्तर पर हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में कब तक ठोस कदम उठाता है।
