RTI के जवाब में तीन दिन के भीतर शिकायतकर्ता के थाने नहीं पहुंचने का दिया गया हवाला; व्यक्तिगत रूप से और आधिकारिक ईमेल से शिकायत देने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का दावा
राउरकेला। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के राउरकेला पुलिस जिला अंतर्गत बंडामुंडा थाना की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। एक शिकायतकर्ता ने थाना प्रभारी रंजन कुमार नायक पर संज्ञेय अपराध से संबंधित शिकायत मिलने के बावजूद प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं करने का आरोप लगाया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि उन्होंने डाक के माध्यम से लिखित शिकायत भेजी, व्यक्तिगत रूप से थाना प्रभारी को शिकायत सौंपने का प्रयास किया और आधिकारिक ईमेल के जरिए भी शिकायत भेजी, लेकिन इसके बावजूद मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।

शिकायतकर्ता के अनुसार, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत जानकारी मांगने पर उन्हें बताया गया कि डाक से शिकायत प्राप्त होने के तीन दिनों के भीतर उनके स्वयं थाने में उपस्थित नहीं होने के कारण FIR दर्ज नहीं की गई। इस कथित जवाब के बाद पुलिस की जवाबदेही, शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया और नागरिकों के कानूनी अधिकारों को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि, पूरे मामले में पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

डाक से शिकायत भेजने के बाद RTI में मिला यह जवाब
शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने कथित संज्ञेय अपराध के संबंध में लिखित शिकायत डाक के माध्यम से बंडामुंडा थाना भेजी थी। काफी समय तक कार्रवाई की जानकारी नहीं मिलने पर उन्होंने RTI के तहत शिकायत पर की गई कार्रवाई का विवरण मांगा।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, बंडामुंडा थाना के जन सूचना अधिकारी सह थाना प्रभारी रंजन कुमार नायक की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया कि शिकायत प्राप्त होने के तीन दिनों के भीतर शिकायतकर्ता स्वयं थाने में उपस्थित नहीं हुए, इसलिए FIR दर्ज नहीं की गई।

इस जवाब के आधार पर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने के बाद शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति को FIR दर्ज करने की अनिवार्य शर्त बनाया जा सकता है? हालांकि, इस प्रश्न पर अंतिम निष्कर्ष के लिए RTI के मूल जवाब, शिकायत की विषयवस्तु और पुलिस रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।
7 जनवरी 2026 को व्यक्तिगत रूप से शिकायत देने का भी दावा
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 7 जनवरी 2026 को उन्होंने थाना प्रभारी रंजन कुमार नायक से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी। इस दौरान कथित अपराध से संबंधित साक्ष्य और तथ्यों के साथ लिखित शिकायत सौंपने का प्रयास किया गया।
उनका दावा है कि थाना प्रभारी ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया और शिकायत की प्रति वापस लौटा दी। यदि ऐसा हुआ है, तो यह जांच का विषय है कि शिकायत में दर्ज तथ्यों का परीक्षण किया गया था या नहीं तथा शिकायत पर कार्रवाई नहीं करने के पीछे क्या कारण थे।
आधिकारिक ईमेल पर शिकायत भेजने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप
शिकायतकर्ता के मुताबिक, उन्होंने उसी रात अपनी शिकायत बंडामुंडा थाना की आधिकारिक ईमेल आईडी iic.bondamunda@odishapolice.gov.in पर भेजी। उनका कहना है कि अगले दिन सुबह वे थाने पहुंचे और ईमेल से भेजी गई शिकायत की प्राप्ति रसीद मांगी। इस दौरान उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि थाने का ईमेल काम नहीं कर रहा है।
यदि आधिकारिक ईमेल सेवा वास्तव में बाधित थी, तो यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि तकनीकी समस्या कब से थी, उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए और इस दौरान शिकायतें प्राप्त करने के लिए कौन-सी वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध थी।
हालांकि, ईमेल सेवा की स्थिति और शिकायत पर की गई कार्रवाई के संबंध में संबंधित पुलिस अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में उठे सवाल
संज्ञेय अपराधों की सूचना पर FIR दर्ज करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh) प्रासंगिक है।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि प्राप्त सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो सामान्यतः FIR दर्ज करना अनिवार्य है। हालांकि, कुछ निर्धारित श्रेणियों के मामलों में सीमित प्रारंभिक जांच की अनुमति भी दी गई है।
ऐसे में इस मामले में यह निर्धारित करने के लिए शिकायत की वास्तविक विषयवस्तु, उपलब्ध साक्ष्य, पुलिस रिकॉर्ड और RTI के जवाब की जांच जरूरी होगी कि संबंधित अधिकारियों की ओर से लागू कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।
डिजिटल व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर सवाल
डिजिटल माध्यमों से सरकारी सेवाओं और शिकायत निवारण व्यवस्था को अधिक सुलभ बनाने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में किसी थाने के आधिकारिक ईमेल की कार्यशीलता और उसके माध्यम से प्राप्त शिकायतों पर कार्रवाई की स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।
शिकायतकर्ता को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसकी शिकायत प्राप्त हुई या नहीं, उस पर क्या कार्रवाई की गई और कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में उसके कारण क्या थे। पारदर्शी रिकॉर्ड और जवाबदेही से ही नागरिकों का संस्थागत व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हो सकता है।
निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग
शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही, यदि जांच में किसी अधिकारी की ओर से कर्तव्य में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई किए जाने की मांग भी की गई है।
खबरसार का सवाल: कानून का उद्देश्य नागरिकों को न्याय तक पहुंचाना और उनकी शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करना है। यदि किसी नागरिक को बार-बार शिकायत देने के बावजूद अपनी बात दर्ज नहीं करा पाने की स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। बंडामुंडा थाना से जुड़े इन आरोपों की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि न तो किसी निर्दोष अधिकारी के साथ अन्याय हो और न ही किसी नागरिक को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित होना पड़े।


