नागरिक सुरक्षा के नाम पर बनने वाली नई व्यवस्था की भूमिका और अधिकार-सीमा स्पष्ट करने की मांग
रायपुर। देश में आधुनिक और व्यापक सिविल डिफेंस स्वयंसेवी व्यवस्था विकसित करने की पहल को लेकर अब लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के सवाल भी चर्चा में आने लगे हैं। सरकार की ओर से ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य युद्ध, आपदा, आतंकवादी घटनाओं और अन्य संकटों के समय प्रशिक्षित नागरिकों की मदद से प्रशासनिक तैयारियों को मजबूत करना बताया जाता है। हालांकि, इस व्यवस्था के अधिकार, नियंत्रण और निगरानी को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है।
नागरिक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी
भारत में सिविल डिफेंस की पुरानी कानूनी व्यवस्था मौजूद है। सिविल डिफेंस अधिनियम, 1968 के तहत नागरिकों और संपत्ति को शत्रुतापूर्ण हमलों से बचाने तथा आपदा से जुड़े कार्यों के लिए संस्थागत ढांचा तैयार किया गया है। ऐसे में विशेषज्ञों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि नई व्यवस्था की भूमिका स्पष्ट रूप से नागरिक सुरक्षा और राहत तक सीमित रहे तथा उसकी शक्तियों और जिम्मेदारियों की संवैधानिक सीमा तय हो।
‘आंतरिक शत्रु’ की परिभाषा पर भी सवाल
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना और असहमति को नागरिक अधिकारों का हिस्सा माना जाता है। इसलिए यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि किसी भी नागरिक स्वयंसेवी व्यवस्था में ‘आंतरिक शत्रु’ जैसे व्यापक शब्दों का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जाएगा।
आलोचकों का कहना है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले किसान, विद्यार्थी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या राजनीतिक कार्यकर्ता को किसी भी स्थिति में केवल असहमति के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था के संदिग्ध दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार से असहमति को राष्ट्रविरोध के समान नहीं माना जा सकता।
इतिहास से सीख लेने की जरूरत
नागरिक समाज के सैन्य प्रशिक्षण और संगठन को लेकर भारत में ऐतिहासिक बहस भी रही है। इस संदर्भ में बी.एस. मुंजे की 1931 में इटली यात्रा और वहां के सैन्य एवं युवा संगठनों के अध्ययन का उल्लेख ऐतिहासिक विमर्श में मिलता है। बाद के दौर में सैन्य प्रशिक्षण से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के विकास को भी इसी व्यापक विचारधारा के संदर्भ में देखा गया है।
हालांकि, वर्तमान भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की तुलना सीधे किसी ऐतिहासिक शासन व्यवस्था से करना उचित नहीं होगा। इसके बावजूद इतिहास से संस्थागत नियंत्रण, नागरिक अधिकार और सत्ता की जवाबदेही से जुड़े सबक लिए जा सकते हैं।
अग्निवीर योजना से जुड़ा एक और नीतिगत पहलू
सिविल डिफेंस व्यवस्था की चर्चा के बीच अग्निवीर योजना भी एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में सामने आती है। चार वर्ष की सैन्य सेवा पूरी करने के बाद अधिकांश अग्निवीर नागरिक जीवन में लौटेंगे, जबकि निर्धारित संख्या में युवाओं को सशस्त्र बलों में आगे सेवा का अवसर मिलेगा।
ऐसे में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा और पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रशिक्षित युवाओं की क्षमता का उपयोग राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट नीति, पारदर्शी प्रक्रिया और राजनीतिक निष्पक्षता जरूरी होगी।
नाजी जर्मनी के उदाहरण से लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सबक
इतिहास में नाजी जर्मनी के दौरान राज्य शक्ति और राजनीतिक निष्ठा के मेल ने जिस तरह नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित किया, वह लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सबक है। हालांकि भारत की प्रस्तावित सिविल डिफेंस व्यवस्था की तुलना सीधे Gestapo या SS जैसे संगठनों से करना उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।
फिर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि किसी भी नागरिक सुरक्षा तंत्र को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने और उसके अधिकारों पर संस्थागत नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं होंगी।
अधिकार और जवाबदेही स्पष्ट करने की मांग
किसी भी नए नागरिक स्वयंसेवी बल की भूमिका तय करते समय कई बुनियादी प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर जरूरी होगा। मसलन, स्वयंसेवकों की भर्ती कौन करेगा, प्रशिक्षण की जिम्मेदारी किसकी होगी, उनका कमांड ढांचा क्या होगा और उन्हें कानून के तहत कितने अधिकार दिए जाएंगे।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि क्या स्वयंसेवकों को किसी नागरिक को रोकने, तलाशी लेने या हिरासत में लेने जैसी शक्तियां दी जाएंगी। यदि ऐसी कोई शक्ति दी जाती है तो उसके इस्तेमाल की सीमा, शिकायत निवारण व्यवस्था और स्वतंत्र निगरानी का तंत्र भी स्पष्ट होना चाहिए।
राजनीतिक निष्पक्षता पर विशेष ध्यान जरूरी
नागरिक सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य तभी प्रभावी माना जा सकता है जब उसमें राजनीतिक निष्पक्षता बनी रहे। भर्ती और प्रशिक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव न हो, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।
साथ ही स्वयंसेवकों के आचरण के लिए स्पष्ट नियम और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय करने की व्यवस्था भी आवश्यक होगी।
नागरिक सुरक्षा तंत्र में संवैधानिक मूल्यों की भूमिका
प्राकृतिक आपदा, युद्ध, आतंकवादी हमले या किसी बड़े राष्ट्रीय संकट के समय प्रशिक्षित नागरिक स्वयंसेवकों की भूमिका प्रशासन के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन ऐसी व्यवस्था को नागरिक सुरक्षा और राहत कार्यों के उद्देश्य तक प्रभावी ढंग से सीमित रखना तथा उसके संचालन में संविधान, मानवाधिकार और कानून के शासन के सिद्धांतों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति एवं पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने के लिए संघर्षरत राकेश प्रताप सिंह परिहार ने नागरिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक निगरानी को महत्वपूर्ण बताया है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्रता और उनके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नागरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संगठित नागरिक शक्ति संविधान के प्रति जवाबदेह रहे और नागरिकों के बीच भय के बजाय सुरक्षा की भावना पैदा करे।




