सांसद निधि से स्वीकृत सरस्वती शिशु मंदिर भवन निर्माण पर फिर उठे सवाल, काम रोकने की वजह पर निष्पक्ष जांच की मांग

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पेंड्रा में करीब 15 लाख रुपये की सांसद निधि से स्वीकृत भवन का निर्माण विवादों में; तकनीकी निरीक्षण के बाद दोबारा शुरू हुआ काम, विद्यालय के पीछे की जमीन और प्रस्तावित रास्ते को लेकर भी उठे सवाल

सांसद निधि से स्वीकृत हुआ भवन निर्माण

पेंड्रा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर के भवन निर्माण को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू की सांसद निधि से करीब 15 लाख रुपये की लागत से भवन निर्माण कार्य स्वीकृत किया गया था। नगर पालिका परिषद पेंड्रा द्वारा निविदा प्रक्रिया पूरी किए जाने के बाद निर्माण कार्य शुरू हुआ था और शिशु मंदिर समिति के सदस्यों की मौजूदगी में भूमि पूजन भी किया गया था।

निर्माण गुणवत्ता को लेकर हुई शिकायत

निर्माण कार्य के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री नीरज जैन द्वारा निर्माण की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की गई। शिकायत के बाद नगर पालिका के वर्तमान उपअभियंता श्री सुरेंद्र श्रीवास ने मौके का निरीक्षण किया और निर्माण में आवश्यक तकनीकी सुधार के निर्देश दिए।

बताया गया कि भवन के पीछे के प्लिंथ में आरसीसी वॉल सहित जरूरी तकनीकी सुधार किए जाने हैं, ताकि निर्माण निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप हो सके।

तकनीकी अधिकारी ने गुणवत्ता पर जताई सख्ती

उपअभियंता श्री सुरेंद्र श्रीवास ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किए जाने की बात कही। साथ ही उन्होंने स्वयं स्थल पर उपस्थित रहकर निर्माण कार्य की निगरानी करने की बात कही थी।

तकनीकी निरीक्षण और आवश्यक सुधार के निर्देशों के बाद 10 सितंबर 2026 को भवन निर्माण का काम दोबारा शुरू किया गया।

दोबारा शिकायत के बाद उठे सवाल

निर्माण कार्य दोबारा शुरू होते ही फिर शिकायत सामने आने के बाद पूरे मामले को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि जब तकनीकी अधिकारी द्वारा स्थल का निरीक्षण कर आवश्यक सुधार के निर्देश दिए जा चुके हैं और निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की बात कही गई है, तो इसके बाद बार-बार शिकायतों के कारण निर्माण कार्य प्रभावित क्यों हो रहा है?

हालांकि शिकायतों के वास्तविक कारण और उनकी वैधता का निर्धारण संबंधित जांच के बाद ही किया जा सकता है।

विद्यालय के पीछे की जमीन भी चर्चा में

इस पूरे विवाद के बीच सरस्वती शिशु मंदिर के पीछे स्थित भूमि को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अलग-अलग चर्चाएं सामने आ रही हैं। प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि गोरेला के एक जायसवाल परिवार द्वारा उक्त भूमि अमरकंटक स्थित शांति कुटीर आश्रम को मंदिर निर्माण के उद्देश्य से दान किए जाने की बात कही जाती है।

इसी भूमि के उपयोग और कथित बिक्री को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन दावों की वास्तविकता संबंधित राजस्व अभिलेखों और वैध दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

क्या रास्ते को लेकर है विवाद?

यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि यदि विद्यालय के पीछे की भूमि पर किसी कॉलोनी अथवा अन्य निर्माण की योजना है और वहां पहुंच मार्ग के लिए सरस्वती शिशु मंदिर की भूमि का उपयोग किए जाने का प्रयास किया जा रहा है, तो इस संबंध में भूमि स्वामित्व, दानपत्र, बिक्री दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और प्रस्तावित रास्ते से जुड़े सभी तथ्यों की जांच आवश्यक है।

साथ ही यह भी जांच का विषय बताया जा रहा है कि विद्यालय की भूमि से रास्ता निकालने के लिए किसी प्रकार का दबाव, प्रलोभन या अन्य प्रयास तो नहीं किया जा रहा। इन सभी आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।

नगर पालिका अध्यक्ष ने रखी निष्पक्ष जांच की मांग

नगर पालिका अध्यक्ष श्री राकेश जालान ने कहा कि सांसद निधि से स्वीकृत राशि जनता के विकास और बच्चों के हित के लिए है। यदि निर्माण में कोई तकनीकी कमी है तो उसे जांच के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए, लेकिन यदि निर्माण कार्य निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो रहा है तो अनावश्यक रूप से कार्य को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भवन का निर्माण गुणवत्तापूर्ण और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए तथा सांसद निधि से स्वीकृत राशि का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाना जरूरी है।

भूमि और निर्माण दोनों की जांच की मांग

श्री राकेश जालान ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी एवं राजस्व जांच कराने की मांग की है। उन्होंने विद्यालय की भूमि, आसपास की जमीन के स्वामित्व, दान और बिक्री से संबंधित दस्तावेजों तथा रास्ते से जुड़े दावों की जांच के साथ भवन निर्माण की गुणवत्ता की भी जांच कराने की मांग रखी।

उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी भी पक्ष की गलती सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही बच्चों के लिए स्वीकृत विकास कार्य को अनावश्यक विवाद के कारण लंबित नहीं रखा जाना चाहिए।

जांच से ही साफ होगी पूरी तस्वीर

अब निगाह जिला प्रशासन की कार्रवाई पर है। यदि प्रशासन तकनीकी और राजस्व दोनों पहलुओं की निष्पक्ष जांच कराता है, तो भवन निर्माण को लेकर उठ रहे सवालों के साथ विद्यालय के पीछे की भूमि और रास्ते से जुड़े दावों की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट हो सकती है।

फिलहाल मुख्य सवाल यही है कि सांसद निधि से स्वीकृत करीब 15 लाख रुपये का यह विकास कार्य निर्धारित गुणवत्ता के साथ कब पूरा होगा और निर्माण में बार-बार सामने आ रही शिकायतों के पीछे वास्तविक वजह क्या है। इन सवालों का अंतिम जवाब जांच और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल के बाद ही सामने आएगा।

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