धरमजयगढ़। SECL की दुर्गापुर-2 खुली खदान परियोजना (Durgapur-2 Open Mine Project) को लेकर वर्षों तक विरोध की राजनीति देखने को मिली, लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। नगर अध्यक्ष, वार्ड पार्षद और कुछ सरपंच अचानक परियोजना के समर्थन में सामने आए हैं। इस बदले रुख ने स्थानीय जनता और प्रभावित किसानों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
वर्षों विरोध के बाद अब समर्थन क्यों?
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को सौंपे गए आवेदन में ड्रोन सर्वे (drone survey), परिसंपत्तियों की गणना और भूमि संबंधी प्रक्रियाओं में सहयोग की बात कही गई है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जिन जनप्रतिनिधियों ने वर्षों तक SECL परियोजना का विरोध किया, वे अब समर्थन की भाषा क्यों बोल रहे हैं?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि कई संदेहों को जन्म देने वाला है। जनता जानना चाहती है कि यह समर्थन वास्तव में प्रभावित परिवारों के हित में है या इसके पीछे कोई अन्य वजह है।
12 साल से अधर में किसानों की जमीन
दुर्गापुर-2 परियोजना के लिए वर्ष 2014 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद 2016 में अधिसूचना जारी हुई और कंपनी को परियोजना आगे बढ़ाने के अधिकार भी मिल गए। इसके बावजूद पिछले 10 से 12 वर्षों तक किसान और प्रभावित परिवार अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास की अनिश्चितता में फंसे रहे।
इतने लंबे इंतजार ने कई परिवारों को आर्थिक रूप से प्रभावित किया। खेती पर निर्भर ग्रामीणों की आय पर असर पड़ा और जमीन का भविष्य अधर में लटका रहा।
किसानों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन किसानों की जमीन वर्षों तक रुकी रही, उनकी आर्थिक क्षति (economic loss) की भरपाई कौन करेगा? क्या केवल सर्वे और कागजी प्रक्रिया पूरी कर देने से 12 वर्षों का नुकसान समाप्त माना जा सकता है?
प्रभावित परिवार अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट और ठोस जवाब चाहते हैं।
मुआवजा और पुनर्वास पर स्पष्टता जरूरी
जनप्रतिनिधियों की प्राथमिक जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वे राज्य सरकार से किसानों के लिए एक समान बाजार मूल्य (market rate compensation), पारदर्शी मुआवजा और बेहतर पुनर्वास (rehabilitation) की मांग करें।
यदि उनकी भूमिका केवल कंपनी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने तक सीमित रहती है, तो ग्रामीणों के मन में संदेह बढ़ना स्वाभाविक है।
जनता पूछ रही—जिम्मेदार कौन?
धरमजयगढ़ की जनता अब सीधा सवाल कर रही है—12 वर्षों की देरी का जिम्मेदार कौन है? किसानों के नुकसान की भरपाई कब होगी? और आखिर अब जनप्रतिनिधियों के सुर क्यों बदल गए?
फिलहाल यही सवाल क्षेत्र की राजनीति और SECL परियोजना के केंद्र में बना हुआ है।


