एक जनतंत्र की खामोश मौत का संपादकीय दस्तावेज़, जहां सवाल कमजोर पड़ते गए और सत्ता की सौदेबाजी पर सवाल उठने लगे
लेखक: राकेश प्रताप सिंह परिहार
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति | पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने हेतु संघर्षरत
लोकतंत्र का पोस्टमार्टम किसी अचानक हुए हादसे की कहानी नहीं सुनाता। इसकी रिपोर्ट की स्याही यह सवाल जरूर उठाती है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को कमजोर करने वाली प्रवृत्तियां धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत करती गई हैं?
लोकतंत्र की सेहत केवल मतदान के दिन दिखाई देने वाली स्याही से तय नहीं होती। उसकी असली ताकत नागरिक की आवाज, सवाल पूछने के अधिकार, स्वतंत्र संस्थाओं, जवाबदेही और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण में दिखाई देती है।
लेकिन जब चुनावी राजनीति में धनबल, पद और राजनीतिक सौदेबाजी की चर्चा जनता के विश्वास पर भारी पड़ने लगे, तब लोकतंत्र की बुनियाद पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जब वोट की कीमत सौदेबाजी से कम आंकने का खतरा पैदा हो
जब एक नागरिक मतदान केंद्र पर जाकर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करता है, तो वह केवल एक बटन नहीं दबाता। वह अपने भविष्य, अपनी उम्मीदों और अपने अधिकारों को एक प्रतिनिधि के हाथों सौंपता है।
लेकिन यदि चुनाव के बाद जनादेश से अधिक महत्व बंद कमरों में होने वाली राजनीतिक बातचीत, दल-बदल या सत्ता के समीकरणों को मिलने लगे, तो मतदाता के विश्वास पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक दल बदलना या गठबंधन बनना संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब इन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और नैतिकता पर लगातार प्रश्न उठते हैं, तब जनता यह पूछने के लिए मजबूर होती है कि उसके मत की वास्तविक भूमिका आखिर कितनी है।
उंगली पर लगी स्याही सिर्फ मतदान का निशान नहीं है। वह नागरिक के अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक है। उसकी गरिमा तभी कायम रह सकती है, जब जनादेश को सत्ता के समीकरणों में सम्मान मिले।
जब आरोपों के बीच बदल जाते हैं राजनीतिक समीकरण
लोकतांत्रिक राजनीति की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि जिन नेताओं पर कभी गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, वे समय और राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ दूसरे राजनीतिक खेमों में दिखाई दे सकते हैं।
किसी व्यक्ति पर आरोप होना और अदालत द्वारा दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए आरोपों को दोषसिद्धि मान लेना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।
फिर भी जनता का सवाल अपनी जगह कायम रहता है—यदि राजनीतिक दल किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोपों को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते हैं और बाद में वही व्यक्ति राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद सहयोगी या महत्वपूर्ण चेहरा बन जाता है, तो क्या राजनीतिक नैतिकता के मानदंड भी बदल जाने चाहिए?
यहीं से पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है।
सवाल कमजोर होंगे तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा
किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है—सवाल पूछने की स्वतंत्रता।
नागरिक पूछता है कि सरकार ने कोई निर्णय क्यों लिया? विपक्ष पूछता है कि नीति का असर क्या होगा? पत्रकार पूछता है कि सरकारी धन कहां खर्च हुआ? और संस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि सत्ता संविधान और कानून की सीमाओं में काम करे।
जब असहमति को संदेह की नजर से देखा जाने लगे और आलोचना को व्यक्तिगत विरोध समझ लिया जाए, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है।
सवालों का होना व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी मजबूती का संकेत है। सवाल दबेंगे तो जवाबदेही कमजोर होगी और जवाबदेही कमजोर होगी तो सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ेगी।
मीडिया की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण
लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल घटनाओं को प्रकाशित करना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी सत्ता से सवाल पूछना, जनता की समस्याओं को सामने लाना और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर बहस को दिशा देना भी है।
लेकिन पत्रकारिता के सामने भी कई चुनौतियां हैं। आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव, संस्थागत दबाव और बदलता मीडिया बाजार स्वतंत्र पत्रकारिता के सामने कठिन परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं।
ऐसे समय में पत्रकारिता का मूल धर्म और भी महत्वपूर्ण हो जाता है—तथ्यों की जांच, दोनों पक्षों को सुनना और सत्ता सहित हर प्रभावशाली पक्ष से सवाल पूछना।
क्या लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित है?
चुनाव लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन लोकतंत्र केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं रहता।
मतदान के बाद भी नागरिक का अधिकार समाप्त नहीं होता। सरकार से सवाल पूछना, सूचना मांगना, शांतिपूर्ण असहमति व्यक्त करना, जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगना और संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसलिए यदि हम लोकतंत्र को केवल चुनाव, ईवीएम और उंगली की स्याही तक सीमित कर देंगे, तो उसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देंगे।
आखिरी सवाल: क्या हम लोकतंत्र की सेहत पर सवाल पूछेंगे?
लोकतंत्र की मौत की घोषणा करना आसान है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी कहीं अधिक कठिन है।
जरूरत इस बात की है कि नागरिक अपने मत के महत्व को समझें, राजनीतिक दलों से पारदर्शिता की मांग करें, पत्रकार सवाल पूछते रहें और संस्थाएं अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन स्वतंत्र रूप से करें।
लोकतंत्र किसी एक दल, नेता या संस्था की संपत्ति नहीं है। यह नागरिकों की सामूहिक व्यवस्था है, जिसकी मजबूती नागरिक चेतना और संस्थागत जवाबदेही से तय होती है।
उंगली पर लगी स्याही तभी सार्थक होगी, जब उसके पीछे नागरिक का अधिकार, उसकी जागरूकता और उसकी आवाज कायम रहे।
सवाल यह नहीं कि लोकतंत्र मर चुका है या नहीं।
सवाल यह है कि हम उसे कितना जवाबदेह, कितना पारदर्शी और कितना मजबूत बनाए रखने के लिए तैयार हैं।
और शायद लोकतंत्र के इस कथित पोस्टमार्टम की सबसे जरूरी रिपोर्ट यही होनी चाहिए—
लोकतंत्र की सांसें तभी चलती रहेंगी, जब नागरिक सवाल पूछते रहेंगे।
