शस्त्र पूजन भारतीय पुलिस की ऐतिहासिक विरासत का अभिन्न अंग, आस्था और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक
दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर पुलिस विभाग में भी परंपरागत रूप से शस्त्र पूजन और शक्ति स्वरूपा मां काली की पूजा-अर्चना की जाती है। यह परंपरा पुलिस बल के शौर्य, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र एवं समाज की सुरक्षा के प्रति समर्पण को दर्शाती है।

देश की प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में आए एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दशहरा पर्व पर मां काली की पूजा-अर्चना कर इस परंपरा का निर्वहन करना पुलिस विभाग की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान को प्रदर्शित करता है।
पुलिस विभाग में शस्त्र पूजन की पुरानी परंपरा
पुलिस विभाग में शस्त्र पूजन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। दशहरा के अवसर पर शस्त्रों की पूजा करना शक्ति, साहस और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसका उद्देश्य जनसुरक्षा की जिम्मेदारी, अनुशासन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के संकल्प को स्मरण करना भी है।
ऐसे में इस परंपरागत आयोजन को किसी एक अधिकारी की ओर से शुरू किए गए नवाचार के रूप में देखने के बजाय पुलिस विभाग की स्थापित परंपरा और सांस्कृतिक आस्था के संदर्भ में समझना उचित है।
परंपरा का सम्मान हो, तथ्यों के आधार पर हो चर्चा
दशहरा जैसे पावन पर्व पर धार्मिक आस्था और पुलिस की शौर्य परंपरा से जुड़े आयोजनों का मूल्यांकन करते समय उनके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। किसी भी घटना पर निष्पक्ष चर्चा तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और संपूर्ण परिस्थितियों के आधार पर होनी चाहिए।
पुलिस बल का मूल उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा करना और समाज में शांति स्थापित करना है। शौर्य परंपराएं पुलिसकर्मियों में कर्तव्यबोध, अनुशासन और जनसेवा के प्रति समर्पण की भावना को सुदृढ़ करने का संदेश देती हैं।
आस्था, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश
दशहरा पर शस्त्र पूजन और मां काली की आराधना भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी है। पुलिस विभाग में इसका महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षा और जिम्मेदारी के संकल्प से भी जुड़ा है।
