कलेक्टर के आदेश की धज्जियां उड़ाईं अधिकारियों ने: सावारांवा में 32 हजार क्विंटल धान गायब, 13 दिन बाद भी नहीं दर्ज हुई एफआईआर प्रशासन की लापरवाही से छवि पर सवालिया निशान

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सूरजपुर। धान खरीदी सीजन किसानों के लिए मुसीबत बन गया, लेकिन कुछ केंद्र प्रभारियों के लिए ‘मुनाफे’ का सुनहरा मौका। अब करोड़ों रुपये के घोटाले सामने आने के बाद भी जिला प्रशासन की खामोशी सवालों का तूफान खड़ा कर रही है।

दरअसल उमेश्वरपुर सहकारी समिति  केंद्र पर तुरंत एफआईआर, दूसरे पर कलेक्टर के सख्त निर्देश के 13 दिन बाद भी सन्नाटे का आलम  दोहरी कार्यशैली न सिर्फ तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रही है, बल्कि जवाबदेह अधिकारियों की घोर लापरवाही को उजागर कर रही है, जो सीधे जिला प्रशासन की छवि को धूमिल कर रही है।

आपको बताते चलें कि इस बार धान खरीदी में पंजीयन से लेकर बिक्री तक किसानों को खासी जद्दोजहद करनी पड़ी। अंतिम सप्ताह में जिला प्रशासन को घर-घर दस्तक देकर बोरियों का सत्यापन करना पड़ा, तब कहीं जाकर खरीदी संभव हो सकी। लेकिन खरीदी केंद्रों पर जो अनियमितताएं सामने आईं, वे पूरे सिस्टम को शर्मसार कर रही हैं। भौतिक सत्यापन में करोड़ों की ‘कागजी धान’ का खेल उजागर हो गया।

उमेश्वरपुर में तत्परता, सावारांवा में सन्नाटा क्यों…?

उमेश्वरपुर सहकारी समिति के धान खरीदी केंद्र में गड़बड़ी पकड़ में आते ही प्रशासन ने तुरंत सक्रियता दिखाई और केंद्र प्रभारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। लेकिन सावारांवा धान खरीदी केंद्र की कहानी बिल्कुल उलट है। यहां सत्यापन में 32,838 क्विंटल धान कम निकला, जबकि वारदाना (बोरियों) में भी भारी अंतर उजागर हुआ। केंद्र प्रभारी सत्यापन के दौरान मौके से फरार मिला।

इसके अलावा  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बीते 10 फरवरी को कलेक्टर सूरजपुर ने जिला सहकारी बैंक शाखा प्रबंधक ओड़गी को स्पष्ट निर्देश दिया था कि इस मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज कराई जाए। लेकिन पूरे 13 दिन बीत जाने के बाद भी संबंधित अधिकारी इस निर्देश का पालन नहीं कर सके। यह कलेक्टर के आदेश की अनदेखी नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की बड़ी लापरवाही है- जो सीधे तौर पर जिला प्रशासन की छवि को प्रभावित कर रही है। किसान पहले ही खरीदी प्रक्रिया से परेशान थे, अब प्रशासन की इस उदासीनता से उनका विश्वास और टूट रहा है।

जनचर्चाओं में गरमा-गरम बहस

एक तरफ उमेश्वरपुर में तत्काल एक्शन, दूसरी तरफ सावारांवा में लंबी चुप्पी… इस दोहरी नीति को लेकर जनमानस में आक्रोश है। लोग खुलकर कह रहे हैं – कहीं राजनीतिक संरक्षण तो नहीं.? कहीं कोई लेन-देन का खेल तो नहीं..? या फिर जिम्मेदार अधिकारी कलेक्टर के निर्देशों को ठुकरा रहे हैं..? हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन सच्चाई यही है कि समाचार लिखे जाने तक खाद्य विभाग और सहकारी बैंक प्रबंधन पूरी तरह खामोश है। न कोई स्पष्टीकरण, न कोई जवाब।

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