⮚ लंबे समय तक सोने के गलत तरीकों से रीढ़, जोड़ों और नसों पर असमान दबाव डालकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं जैसे पुराना मस्कुलोस्केलेटल दर्द, रीढ़ की क्षति और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, पैदा कर सकती है।
⮚ विकसित प्रणाली मरीज की गोपनीयता को प्रभावित किए बिना उसके सोने के ढंग की निगरानी करती है।
राउरकेला, 31 मार्च 2026: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला (एनआईटी राउरकेला) के शोधकर्ताओं ने एक एआई-सक्षम प्रणाली विकसित की है जो मनुष्य के सोने के तरीकों पर नज़र रख सकती है। यह स्वास्थ्य सेवाओं में उपयोगी है, क्योंकि यह मरीजों की गोपनीयता बनाए रखते हुए बिना किसी बाधा के उनकी निगरानी कर सकती है, यहां तक कि जब वे कंबल से ढके हों।

इस शोध के निष्कर्ष आईईईई सेंसर जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध पत्र के सह-लेखक, एनआईटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर, प्रो सप्तर्षि चटर्जी और उनके बी.टेक छात्र शिलादित्य मंडल के साथ जादवपुर यूनिवर्सिटी के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर, प्रो देबांगशु डे हैं।

दुनिया भर के अध्ययन बताते हैं कि लंबे समय तक सोने के ख़राब तरीके रीढ़, जोड़ों और नसों पर असमान दबाव डालकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है। एक शारीरिक रूप से सक्रिय व्यक्ति में भी इससे दीर्घकालिक मस्कुलोस्केलेटल दर्द, रीढ़ की क्षति, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, नसों को नुकसान, पाचन समस्याएं, एसिड रिफ्लक्स और गठिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बिस्तर पर पड़े मरीजों के लिए खराब पोस्चर प्रेशर अल्सर (बेडसोर) जैसी गंभीर जटिलताएं उत्पन्न कर सकती है।
वर्तमान में, मरीजों की पोस्चर की निगरानी अधिकतर मैन्युअल रूप से की जाती है, जो अस्पष्ट भी हो सकती है और इसमें मानवीय गलतियों की संभावना बनी रहती है। इसका एक विकल्प पहनने योग्य सेंसर हैं, लेकिन वे अक्सर महंगे और असुविधाजनक होते हैं। इसके अतिरिक्त कैमरा-आधारित प्रणालियां भी मौजूद हैं, लेकिन कम रोशनी, मरीज़ को ढका हुआ कम्बल और गोपनीयता संबंधी चिंताओं के कारण उनकी उपयोगिता सीमित रहती है।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए, प्रो सप्तर्षि चटर्जी और उनकी टीम ने एक एआई-आधारित प्रणाली विकसित की, जिसमें तीन प्रकार के सेंसर उपयोग किए गए हैं:
● एक लॉन्ग-वेव इन्फ्रारेड इमेजिंग सेंसर, जो शरीर की गर्मी को ट्रैक करता है और बिना दृश्य चित्र कैप्चर किए, कंबल के नीचे भी सोने के तरीके की निगरानी करता है
● एक डेप्थ सेंसर, जो शरीर के आकार और पोस्चर को रिकॉर्ड करता है
● एक प्रेशर सेंसर, जो बिस्तर पर शरीर के वजन के वितरण को मापता है
इन सेंसरों से मिले डेटा को समझने के लिए टीम ने एक जनरेटिव एआई मॉडल बनाया है, जो ग्राफ-आधारित न्यूरल नेटवर्क की मदद से शरीर का स्पष्ट चित्र तैयार करता है और जोड़ों की स्थिति पहचानने में सक्षम है।
विकसित प्रणाली के बारे में बताते हुए एनआईटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर, प्रो सप्तर्षि चटर्जी ने कहा, “हमारी प्रणाली जनरेटिव एआई के साथ एक फ्यूजन तकनीक का उपयोग करती है, जिसमें लो-वेव इन्फ्रारेड, डेप्थ और प्रेशर मैप डेटा को मिलाकर बिना सीधे रेड ग्रीन ब्लू (आरजीबी) इमेज का उपयोग किए सोने के तरीके का पता लगाया जाता है। यह मॉडल कम रोशनी और विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करता है।”
हीट-आधारित इमेजिंग, शरीर के आकार के डेटा और प्रेशर जानकारी को मिलाकर यह प्रणाली सटीक परिणाम देती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस नो-कॉन्टैक्ट मॉडल ने लगभग 98% सटीकता प्राप्त की है, जिससे यह वास्तविक उपयोग के लिए विश्वसनीय बनता है।
इस प्रणाली की स्वचालित विशेषता देखभाल करने वालों के कार्यभार को कम कर सकती है और लगातार निगरानी संभव बनाती है। साथ ही, चूंकि यह दृश्य इमेजिंग का उपयोग नहीं करती, इसलिए यह मरीज की गोपनीयता भी सुरक्षित रखती है।
इस तकनीक के वास्तविक उपयोगों के बारे में बताते हुए प्रो. चटर्जी ने कहा, “इस प्रणाली को सीधे रोगी के बिस्तर पर लगाया जा सकता है, जिससे अस्पताल के मरीजों, बुजुर्गों और स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों की नींद की स्थिति की निगरानी की जा सकती है।”
मल्टी-मोडल इमेजिंग सिस्टम के साथ एकीकृत मॉड्यूल के रूप में उपयोग के लिए इस तकनीक की अनुमानित लागत लगभग रु. 30,000 होगी, जिसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ और कम किया जा सकता है।
अगले चरण में, शोध टीम इस तकनीक का उपयोग गलत सोने के तरीकों से संबंधित विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं और अन्य बीमारियों की पहचान के लिए करने की योजना बना रही है।
अधिक परिष्करण और वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण के बाद, यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यावहारिक रूप से लागू की जा सकती है। इसकी स्केलेबिलिटी और अनुकूलन क्षमता अस्पतालों के अलावा घरेलू देखभाल जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक उपयोग की संभावनाएं खोलती है।
