पश्चिम बंगाल में पहली बार ऐतिहासिक बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के ठीक तीन हफ्ते बाद प्रशासनिक गलियारों में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार सुबह अपने मंत्रिमंडल का पहला और बड़ा विस्तार कर दिया है।
कोलकाता के नबन्ना में आयोजित एक भव्य और औपचारिक समारोह के दौरान सुबह 11 बजे राज्य के राज्यपाल आरएन रवि ने भारतीय जनता पार्टी के 35 विधायकों को मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस नए विस्तार के साथ ही राज्य की नई नवेली सरकार का पूरा प्रशासनिक खाका और आकार स्पष्ट हो गया है।
मंत्रिपरिषद का नया आकार और संवैधानिक स्थिति
इस बड़े विस्तार के बाद पश्चिम बंगाल की मंत्रिपरिषद की कुल संख्या बढ़कर अब 41 हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और 9 मई को उनके साथ शपथ लेने वाले पांच कैबिनेट मंत्रियों के बाद अब इस टीम को बड़ा रूप दिया गया है। वर्तमान में शुभेंदु कैबिनेट के भीतर 13 कैबिनेट मंत्री, 19 राज्य मंत्री और 3 स्वतंत्र प्रभार मंत्री शामिल किए गए हैं।
91वें संवैधानिक संशोधन के नियमों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में मंत्रियों की अधिकतम संख्या 44 हो सकती है, जिसका मतलब है कि अधिकारी सरकार अभी भी तय सीमा से तीन पद पीछे है।
कैबिनेट मंत्रियों की सूची में अनुभव को तरजीह
मंत्रिमंडल के इस विस्तार में क्षेत्र और अनुभव को ध्यान में रखते हुए एक विशेष संतुलन बनाने की कोशिश साफ नजर आ रही है। जिन 13 प्रमुख चेहरों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है, उनमें दीपक बर्मन, तापस रॉय, डॉ. शंकर घोष, मनोज कुमार उरांव, अर्जुन सिंह, गौरी शंकर घोष, स्वपन दासगुप्ता, जगन्नाथ चट्टोपाध्याय, कल्याण चक्रवर्ती, अजय पोद्दार, सारद्वत मुखर्जी, दूध कुमार मंडल और अनूप कुमार दास जैसे नाम शामिल हैं। इस नई टीम में पुराने अनुभवी राजनेताओं के साथ-साथ युवाओं की ऊर्जा का भी बेहतर समन्वय देखने को मिल रहा है।
इस कैबिनेट विस्तार के जरिए भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल के भीतर एक बेहद मजबूत सामाजिक और क्षेत्रीय संदेश देने का प्रयास किया है। मंत्रिमंडल में पहले से ही महिला प्रतिनिधित्व के तौर पर अग्निमित्रा पॉल, मतुआ समुदाय से अशोक कीर्तनिया, राजबंशी समुदाय से निसिथ प्रमाणिक और आदिवासी समाज से क्षुदीराम टुडू जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। अब 35 नए मंत्रियों के शामिल होने से राज्य के अन्य पिछड़े, क्षेत्रीय और विभिन्न सामाजिक समुदायों को भी सीधे तौर पर सत्ता में भागीदारी मिल गई है, जिससे आगामी प्रशासनिक फैसलों को जमीन पर उतारना आसान होगा।


