एनएच-49 किनारे शासकीय भूमि पर कब्जे के आरोप, राजस्व अभिलेखों में खसरा नंबरों की उलझन और न्यायालयीन डिक्री के बावजूद सीमाविवाद का दावा; 100 प्रतिशत दिव्यांग बच्चे के पिता की आजीविका उजड़ने पर प्रशासन की जवाबदेही कटघरे में
रायगढ़ | विशेष पड़ताल
न्यायालय में जमीन का विवाद विचाराधीन हो, सुनवाई की तारीख सामने हो और इसी बीच विवादित स्थल पर बुलडोजर चलने के साथ रातोंरात बाउंड्रीवाल खड़ी होने के आरोप सामने आएं, तो मामला महज जमीन की नापजोख तक सीमित नहीं रह जाता। यह कानून के शासन, राजस्व प्रशासन की निष्पक्षता और कमजोर नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है। रायगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग-49 किनारे बांजीपाली और छातामुड़ा की सीमा से जुड़ा विवाद अब इन्हीं सवालों के घेरे में है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, तहसील न्यायालय रायगढ़ में प्रकरण क्रमांक अ-70/2025-26 के तहत भूमि विवाद विचाराधीन था और अगली पेशी 24 अक्टूबर 2026 को निर्धारित थी। आरोप है कि सुनवाई से पहले 20 और 21 अक्टूबर को मौके पर जेसीबी मशीनें पहुंचीं और पिछले लगभग तीन वर्षों से संचालित चाय दुकान को तोड़ दिया गया। इसके बाद 22 अक्टूबर की रात ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से निर्माण सामग्री लाकर विवादित स्थल पर कंक्रीट की बाउंड्रीवाल खड़ी किए जाने का आरोप लगाया गया है।
यदि घटनाक्रम शिकायत में वर्णित तथ्यों के अनुरूप है, तो सबसे अहम सवाल यह है कि निर्माण और तोड़फोड़ किसके आदेश पर हुई? क्या इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति थी? क्या संबंधित पक्ष को कोई नोटिस दिया गया था? और जब जमीन का विवाद न्यायालय में विचाराधीन था, तब मौके की स्थिति बदलने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल मौके की तस्वीरों से नहीं, बल्कि संबंधित आदेशों, राजस्व अभिलेखों, सीमांकन रिपोर्ट और प्रशासनिक पक्ष की जांच से ही सामने आ सकता है। लेकिन जब तक इनका जवाब नहीं मिलता, तब तक विवादित भूमि पर तेजी से हुए निर्माण को लेकर संदेह और सवाल बने रहना स्वाभाविक है।
सरकारी अभिलेखों में शासन का नाम, फिर जमीन पर निजी बाउंड्री किस आधार पर?
इस प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू ग्राम बांजीपाली स्थित खसरा नंबर 156 को लेकर है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए जाने का दावा किए गए बी-1 प्रपत्र और डिजिटल खसरा अभिलेख के अनुसार, इस भूमि का कुल रकबा 0.0850 हेक्टेयर बताया गया है और अभिलेख में छत्तीसगढ़ शासन, राजस्व विभाग का नाम दर्ज होने की बात कही गई है।
यदि संबंधित भूमि आज भी शासकीय मद में दर्ज है, तो उसके उपयोग, स्वामित्व और सीमाओं की पुष्टि किए बिना उस पर निजी निर्माण किए जाने का प्रश्न अत्यंत गंभीर है। क्या भूमि के किसी हिस्से का विधिवत भू-अर्जन हुआ है? क्या राष्ट्रीय राजमार्ग से संबंधित कोई अधिसूचना, अधिग्रहण आदेश अथवा हस्तांतरण अभिलेख मौजूद है? यदि ऐसा कोई दस्तावेज है, तो उसका विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि शासकीय भूमि पर निजी निर्माण का आरोप गलत है, तो प्रशासन अभिलेखों के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। राजस्व रिकॉर्ड में शासन का नाम दर्ज होना अपने आप में हर प्रकार के अतिक्रमण का अंतिम प्रमाण नहीं है। इसके लिए मौके की वास्तविक स्थिति, भूमि की प्रकृति, सीमांकन और लागू आदेशों का परीक्षण जरूरी है। मगर यही परीक्षण यदि समय रहते और निष्पक्ष ढंग से नहीं किया जाता, तो विवाद बढ़ने और सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जे की आशंका को बल मिलने से इनकार नहीं किया जा सकता।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि विवादित स्थल पर ट्रैक्टरों के माध्यम से कंक्रीट के खंभे और स्लैब लाकर लगाए गए। ऐसे में प्रशासन के सामने अब केवल शिकायत का जवाब देने का नहीं, बल्कि भूमि की वास्तविक सीमा और निर्माण की वैधता स्पष्ट करने का दायित्व है।
एक खसरा, दो तहसीलों का विवाद: राजस्व व्यवस्था की परीक्षा
मामले में खसरा नंबर 155/2 को लेकर भी गंभीर आपत्ति सामने आई है। उपलब्ध कराए जाने का दावा किए गए विवरण के अनुसार, इस खसरे का रकबा 0.1090 हेक्टेयर है और भूमि पूजा अग्रवाल तथा नाबालिग राघव अग्रवाल के नाम दर्ज बताई गई है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि हाईवे से लगे इस भूखंड के अलग-अलग हिस्सों को छातामुड़ा हल्का, तहसील पुसौर और बांजीपाली हल्का, तहसील रायगढ़ से संबंधित बताया जा रहा है। सीमांकन की प्रक्रिया और अभिलेखों में इस कथित असंगति को लेकर उसने आपत्ति दर्ज कराए जाने की बात भी कही है।
यहां मूल प्रश्न किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि अभिलेखों की शुद्धता और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता का है। क्या दोनों तहसीलों के राजस्व नक्शों का मिलान किया गया? क्या खसरे की सीमाओं, रकबे और स्वामित्व संबंधी प्रविष्टियों की संयुक्त जांच हुई? क्या सीमांकन के दौरान संबंधित पक्षों की आपत्तियों को विधिवत दर्ज कर उनका निराकरण किया गया?
यदि एक ही भूखंड की सीमा को लेकर दो राजस्व क्षेत्रों के अभिलेखों में भ्रम अथवा विसंगति है, तो उसका समाधान तकनीकी और दस्तावेजी जांच से होना चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी एक पक्ष द्वारा मौके पर निर्माण कर लेना विवाद का समाधान नहीं, बल्कि दूसरे पक्ष के अधिकारों और प्रशासनिक निष्पक्षता पर नए प्रश्न खड़े कर सकता है।
इसलिए दोनों तहसीलों के सक्षम अधिकारियों की मौजूदगी में संयुक्त सीमांकन, राजस्व नक्शों का मिलान और संबंधित अभिलेखों की जांच इस मामले में निर्णायक कदम हो सकते हैं।
12 वर्षों से विवाद का दावा, न्यायालयीन डिक्री के बावजूद किसान परेशान?
ग्राम बांजीपाली निवासी कृषक फत्तेचंद पटेल की शिकायत इस विवाद को और गंभीर बनाती है। शिकायतकर्ता के अनुसार, उनकी पैतृक भूमि खसरा नंबर 154/1ख/1 का रकबा 1.85 एकड़ है और पिछले 10 से 12 वर्षों से इस भूमि की सीमा को लेकर विवाद बना हुआ है।
आरोप है कि खसरा नंबर 155/1ख के नाम पर भूमि के निचले और गड्ढेनुमा हिस्सों में मिट्टी तथा मलबा डालकर बार-बार विवाद की स्थिति पैदा की गई। शिकायतकर्ता ने यह भी उल्लेख किया है कि व्यवहार न्यायालय वर्ग-1, रायगढ़ में प्रकरण क्रमांक 88-ए/2012 में 9 अगस्त 2017 को उनके पक्ष में फैसला और डिक्री पारित हुई थी। उनके अनुसार, बाद की न्यायिक कार्यवाही में भी इस निर्णय की पुष्टि हुई।
इस दावे की वास्तविक कानूनी स्थिति समझने के लिए न्यायालयीन डिक्री, संबंधित आदेशों और विवादित स्थल के बीच सटीक संबंध का परीक्षण जरूरी है। किसी न्यायालयीन निर्णय
की मौजूदगी अपने आप में आसपास की प्रत्येक भूमि के स्वामित्व अथवा वर्तमान कब्जे का निर्धारण नहीं करती। लेकिन यदि डिक्री वास्तव में इसी विवादित भूमि और संबंधित पक्षों पर लागू होती है, तो उसके प्रभाव की अनदेखी किए जाने का आरोप अत्यंत गंभीर है।
सवाल यह है कि क्या राजस्व और पुलिस प्रशासन ने शिकायतों के साथ संलग्न न्यायालयीन दस्तावेजों का परीक्षण किया? क्या संबंधित भूमि की यथास्थिति को लेकर किसी सक्षम न्यायालय अथवा प्राधिकारी का आदेश है? यदि ऐसा आदेश मौजूद है, तो उसका पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
न्यायालयीन आदेशों की वास्तविक सीमा और प्रभाव का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों से ही होगा। लेकिन किसी किसान को वर्षों तक अपनी जमीन की सीमा को लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें और विवादित स्थल पर नए निर्माण के आरोप सामने आएं, तो प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है।
तीन साल की मेहनत मलबे में तब्दील, दिव्यांग बच्चे की दवाइयों का संकट
इस पूरे विवाद का मानवीय पक्ष भी कम गंभीर नहीं है। शिकायत के अनुसार, कैलाश आचार्य स्थानीय किसान की सहमति से पिछले लगभग तीन वर्षों से ‘जय भोले टी सेंटर’ नाम से चाय की दुकान संचालित कर रहे थे। आरोप है कि इसी दुकान को जेसीबी से तोड़ दिया गया, जिससे उनकी रोजी-रोटी का साधन छिन गया।
पीड़ित का कहना है कि उनके पास सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय का उद्यम पंजीयन प्रमाणपत्र, पैन कार्ड, बिजली कनेक्शन और आकलन वर्ष 2026-27 का आयकर रिटर्न है। उनके दावे के अनुसार, संबंधित रिटर्न में लगभग 13.19 लाख रुपये का कारोबार दर्ज है। उन्होंने स्वयं को कर्मकार कल्याण मंडल में पंजीकृत श्रमिक भी बताया है।
यहां स्पष्ट होना चाहिए कि उद्यम पंजीयन, बिजली कनेक्शन अथवा आयकर रिटर्न किसी विवादित भूमि पर स्वामित्व का स्वतः प्रमाण नहीं होते। लेकिन ये दस्तावेज दुकान के संचालन, कारोबारी गतिविधियों और आजीविका से जुड़े दावों की जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पीड़ित ने यह भी बताया है कि उनका 10 वर्षीय बड़ा बेटा शत-प्रतिशत दिव्यांग है और उसे नियमित दवाइयों की आवश्यकता होती है। परिवार के अनुसार, उपचार पर हर महीने लगभग 5,000 रुपये खर्च होते हैं। दुकान टूटने के बाद आय का साधन प्रभावित होने, ऋण की किस्तों और बच्चे के उपचार का खर्च उठाने की चिंता ने परिवार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
यदि दुकान तोड़ने की कार्रवाई बिना आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के हुई है, तो यह केवल संपत्ति के नुकसान का मामला नहीं रहेगा, बल्कि एक परिवार की आजीविका पर पड़े प्रभाव का प्रश्न भी बनेगा। वहीं, यदि संबंधित पक्ष के पास कार्रवाई की वैध अनुमति थी, तो प्रशासन को उसका आधार स्पष्ट करना चाहिए।
किसी नागरिक की आर्थिक कमजोरी उसे कानून से ऊपर नहीं रखती, लेकिन कानून का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी किसी नागरिक की हैसियत देखकर कम या ज्यादा नहीं हो सकती।
धमकियों का आरोप भी गंभीर, पुलिस की जांच जरूरी
शिकायतकर्ता ने विरोध करने पर झूठे मामलों में फंसाने और जान से मारने की धमकी दिए जाने का आरोप भी लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी आवश्यक है। यदि शिकायत में धमकियों से संबंधित विवरण या साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं, तो पुलिस को उनका निष्पक्ष परीक्षण करना चाहिए।
भूमि विवाद का निपटारा बल, दबाव या धमकी के सहारे नहीं किया जा सकता। किसी भी पक्ष को अपनी बात रखने, दस्तावेज प्रस्तुत करने और वैधानिक उपाय अपनाने का अधिकार है। यदि किसी पक्ष ने कानून हाथ में लिया है, तो उसकी जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।
प्रशासन के सामने अब जवाबदेही की कसौटी
इस मामले में जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और पुलिस के सामने कुछ सीधे प्रश्न हैं।
पहला, क्या तहसील न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण से संबंधित भूमि पर निर्माण या तोड़फोड़ के लिए कोई सक्षम आदेश जारी हुआ था? यदि हां, तो उसका विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
दूसरा, खसरा नंबर 156 की वर्तमान राजस्व स्थिति क्या है? क्या 0.0850 हेक्टेयर भूमि वास्तव में शासन के नाम दर्ज है और यदि हां, तो मौके पर निर्मित बाउंड्रीवाल की स्थिति क्या है?
तीसरा, खसरा नंबर 155/2 से जुड़े अभिलेखों और दोनों तहसीलों के सीमांकन संबंधी विवरणों में कथित विसंगति की जांच किस स्तर पर हुई है?
चौथा, फत्तेचंद पटेल द्वारा प्रस्तुत बताई गई न्यायालयीन डिक्री का विवादित स्थल से क्या संबंध है और क्या संबंधित अधिकारियों ने उसका परीक्षण किया है?
पांचवां, चाय दुकान तोड़ने की कार्रवाई किसके निर्देश पर हुई? क्या कोई पूर्व नोटिस दिया गया था? यदि नहीं, तो कार्रवाई का कानूनी आधार क्या था?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी आरोप को स्वतः सही या गलत घोषित करने के बजाय दस्तावेजों, निष्पक्ष सीमांकन और संबंधित पक्षों के आधिकारिक पक्ष के आधार पर दिया जाना चाहिए। प्रशासन को शिकायतकर्ता के आरोपों की जांच के साथ उन लोगों का पक्ष भी दर्ज करना चाहिए, जिन पर निर्माण अथवा कब्जे को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
फिलहाल उपलब्ध विवरण के आधार पर संबंधित पक्षों का आधिकारिक जवाब और प्रशासन की जांच संबंधी निष्कर्ष सामने आना बाकी है। इसलिए किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस अनिश्चितता का अर्थ यह भी नहीं कि सवाल पूछना बंद कर दिया जाए।
बहरहाल, रायगढ़ के इस जमीन विवाद में असली परीक्षा किसी की रसूख की नहीं, कानून की निष्पक्षता की है। यदि भूमि शासकीय है, तो उसकी रक्षा कौन करेगा? यदि सीमांकन गलत है, तो उसे सुधारेगा कौन? और यदि गरीब की दुकान बिना वैध प्रक्रिया के तोड़ी गई है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
क्योंकि कानून की असली ताकत बुलडोजर की आवाज में नहीं, उस न्याय में दिखाई देती है जो सबसे कमजोर नागरिक तक बिना भय और भेदभाव के पहुंचता है।


