नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की: आधी रात गूंजेगा जन्मोत्सव, 46 मिनट के निशीथ काल में होगा कान्हा का अभिषेक

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रोहिणी नक्षत्र के बीच मध्यरात्रि में मनाया जाएगा श्रीकृष्ण प्राकट्योत्सव, मंदिरों में विशेष पूजा की तैयारी

बिलासपुर। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर मंदिरों में विशेष सजावट, झांकियों और पूजा-अर्चना की तैयारियां की गई हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्मोत्सव का मुख्य आयोजन रात 12 बजे के आसपास किया जाएगा।

46 मिनट का रहेगा विशेष निशीथ काल

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार जन्मोत्सव के लिए रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक का समय विशेष माना गया है। यह अवधि कुल 46 मिनट की है। इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का अभिषेक, श्रृंगार और जन्मोत्सव से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे।

अष्टमी तिथि 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है। वहीं व्रत रखने वाले श्रद्धालु 5 सितंबर को सुबह 5:47 बजे सूर्योदय के बाद पारण कर सकेंगे।

पंचामृत से होगा बाल गोपाल का अभिषेक

मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक किया जाएगा। दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से स्नान कराने के बाद भगवान को नए वस्त्र पहनाकर विशेष श्रृंगार किया जाएगा।

पीतांबर, चंदन का तिलक और मोरपंख से सजे बाल गोपाल का स्वरूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहेगा।

माखन-मिश्री और तुलसी दल का लगेगा भोग

जन्मोत्सव के दौरान भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री सहित विभिन्न पकवानों का भोग लगाया जाएगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार भोग में तुलसी दल भी अर्पित किया जाता है। इसके बाद भक्त भगवान की आरती कर प्रसाद ग्रहण करेंगे।

शंख-घंटियों से गूंजेंगे मंदिर

जैसे ही मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समय होगा, मंदिरों में शंख, घंटियों और जयकारों की गूंज सुनाई देगी। आरती के बाद बाल गोपाल को सजे हुए पालने में विराजित कर श्रद्धालु उन्हें झूला झुलाएंगे।

‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ जैसे जयघोष से मंदिरों और धार्मिक स्थलों का वातावरण भक्तिमय हो उठेगा।

श्रीकृष्ण जन्म की गाथा से जुड़ी है विशेष मान्यता

धार्मिक कथाओं के अनुसार मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। कंस के अत्याचारों के बीच जन्मे श्रीकृष्ण को सुरक्षित गोकुल पहुंचाने के लिए वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार गए थे।

मान्यता है कि उस समय भारी वर्षा के बीच यमुना का जल उफान पर था। वसुदेव जब बालकृष्ण को लेकर आगे बढ़े तो यमुना ने भगवान के चरणों का स्पर्श किया। इसके बाद श्रीकृष्ण को गोकुल में माता यशोदा के पास पहुंचाया गया।

अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान के प्राकट्य का उत्सव होने के साथ-साथ धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक भी मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से कर्म, धर्म, सत्य और कर्तव्य का संदेश दिया।

जन्माष्टमी पर होने वाले धार्मिक आयोजन इसी आस्था और संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं। मंदिरों में मध्यरात्रि के जन्मोत्सव के साथ भक्त भगवान श्रीकृष्ण से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करेंगे।

अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर छत्तीसगढ़

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