स्वतंत्रता दिवस विशेष : तिरंगे से आगे की आजादी, संवैधानिक अधिकारों की गारंटी ही स्वतंत्रता की असली कसौटी

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रायगढ़। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को स्मरण करने के साथ नागरिक स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ पर विचार करना भी जरूरी है। लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी एच. पी. जोशी ने अपने विशेष आलेख में कहा है कि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल अपना झंडा, सरकार और सीमाएं होने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि नागरिकों को संविधान द्वारा प्राप्त अधिकार कितनी स्वतंत्रता, निर्भीकता और गरिमा के साथ प्राप्त हो रहे हैं।

संविधान नागरिक अधिकारों की आधारशिला
एच. पी. जोशी के अनुसार भारत की स्वतंत्रता का अर्थ केवल 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण नहीं था। संविधान ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को राज्य की शक्ति पर संवैधानिक मर्यादा प्रदान की है। अनुच्छेद 12 और 13 के माध्यम से राज्य की परिधि तथा मौलिक अधिकारों के संरक्षण की व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकार किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं।

अभिव्यक्ति और असहमति भी लोकतंत्र का हिस्सा
आलेख में कहा गया है कि नागरिक अपने विचार व्यक्त कर सके, सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठा सके, शांतिपूर्ण विरोध कर सके और न्यायालय की शरण ले सके, तभी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ दिखाई देता है। संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक सभा करने जैसे अधिकार प्रदान करता है, हालांकि इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लागू होते हैं।

समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा का आधार है। लेखक ने कहा कि स्वतंत्रता केवल जीवन जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक की गरिमा, निष्पक्षता और न्यायपूर्ण प्रक्रिया भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

न्यायपालिका और कानून का शासन
आलेख में अनुच्छेद 32 और 226 के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में नागरिक न्यायालय की शरण ले सकता है। न्यायालय अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश और निर्देश जारी कर सकते हैं। इन आदेशों को कानून के अनुसार प्रभावी बनाने में पुलिस और अन्य विधि-प्रवर्तन संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वर्दी शक्ति नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी का प्रतीक
एच. पी. जोशी ने पुलिस की भूमिका पर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वर्दी केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि कानून के अधीन शक्ति का प्रतीक है। पुलिस की प्रतिष्ठा उसके पास मौजूद शक्ति से अधिक उस शक्ति के वैधानिक, निष्पक्ष और संयमित इस्तेमाल से तय होती है। इसी तरह सेना और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल देश की संप्रभुता, सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कमजोर नागरिकों के अधिकार ही असली परीक्षा
आलेख में सवाल उठाया गया है कि क्या गरीब, कमजोर, महिला, बच्चे, श्रमिक और वंचित वर्ग का व्यक्ति भी कानून के समक्ष स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है? क्या सत्ता से असहमत नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख सकता है? लेखक के अनुसार स्वतंत्रता की वास्तविक परीक्षा इन्हीं सवालों के जवाब में छिपी है।

अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जरूरी
लेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अधिकारों की स्वतंत्रता और कानून की मर्यादा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ किसी दूसरे की गरिमा को ठेस पहुंचाने की स्वतंत्रता नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार हिंसा का अधिकार नहीं है। नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों, गरिमा और स्वतंत्रता का भी सम्मान करना चाहिए।

तिरंगा स्वतंत्रता का प्रतीक, संविधान उसकी गारंटी
लेखक ने कहा कि तिरंगा राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रतीक है, जबकि नागरिक की संविधान-सम्मत स्वतंत्र आवाज उस स्वतंत्रता की जीवंत अभिव्यक्ति है। स्वतंत्रता दिवस केवल अतीत के बलिदानों को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के संकल्प का दिन भी है।

‘नागरिकों को मिलने वाली गारंटी ही आजादी का असल मतलब’
आलेख के अंत में कहा गया है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ विचार करने, अपनी बात कहने, संविधान की सीमाओं के भीतर शांतिपूर्ण विरोध करने, समानता और गरिमा के साथ जीने तथा न्याय पाने का अधिकार है। तिरंगा स्वतंत्रता का प्रतीक है, संविधान उसकी गारंटी है और कानून का शासन उसकी वास्तविक सुरक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी है।

लेखक परिचय: एच. पी. जोशी — लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी। उन्हें मानवाधिकार विषयों का जानकार बताया गया है।

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