गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मरवाही जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत रूमगा की सोन नदी में कथित अवैध रेत उत्खनन और बिना रॉयल्टी पर्ची रेत परिवहन का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। ग्रामीणों, सरपंच और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि शासन को लाखों रुपये के गौण खनिज राजस्व का नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जबकि ग्रामीणों से अवैध वसूली कर रेत दी जा रही है।
ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि सोन नदी की रेत खदान का ठेका प्रिया दुबे को मिला है, लेकिन ठेके की आड़ में बिना रॉयल्टी पर्ची के खुलेआम रेत का उत्खनन और परिवहन किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, शासकीय निर्माण कार्य और निजी मकान निर्माण के लिए रेत लेने आने वाले लोगों से प्रति ट्रैक्टर 300 रुपये वसूले जाते हैं, लेकिन उन्हें कोई वैध रॉयल्टी पर्ची नहीं दी जाती।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि रेत खदान की देखरेख पेण्ड्रा निवासी सौरभ साहू कर रहा है और उसी के माध्यम से अवैध उत्खनन संचालित किया जा रहा है। बिना पर्ची रेत ले जाने के कारण रास्ते में माइनिंग विभाग द्वारा ट्रैक्टर पकड़े जाने पर ग्रामीणों को परेशानी और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि ग्राम पंचायत ने खदान की नीलामी इस शर्त पर प्रस्तावित की थी कि गांव के प्रधानमंत्री आवास, शासकीय निर्माण और स्थानीय ग्रामीणों के व्यक्तिगत निर्माण कार्यों हेतु रेत परिवहन की सुविधा दी जाएगी, क्योंकि यह अनुसूचित एवं पेशा अधिनियमित क्षेत्र है। इसके बावजूद ग्रामीणों को परेशान किया जा रहा है।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब ग्रामीणों ने बिना रॉयल्टी पर्ची रेत परिवहन करते हुए डंपर क्रमांक CG31B8637 को रोका। ग्रामीणों का आरोप है कि वाहन में किसी प्रकार की वैध रॉयल्टी नहीं थी। इसके बाद ग्रामीणों ने तत्काल पुलिस चौकी कोटमी को सूचना देकर वाहन सौंपा और कार्रवाई की मांग की, लेकिन कथित रूप से बिना किसी ठोस कार्रवाई के वाहन छोड़ दिया गया।
इस पूरे मामले को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस (All India Adivasi Congress) की राष्ट्रीय समन्वयक अर्चना पोर्ते ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, अवैध उत्खनन पर रोक और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही ग्राम पंचायत रूमगा को रेत उत्खनन का अधिकार सौंपने की मांग भी उठाई गई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर बिना रॉयल्टी पर्ची के रेत परिवहन कैसे हो रहा था? यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं तो शासन को हो रहे राजस्व नुकसान और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े होना तय है।


