मातृभाषा से डिजिटल क्रांति तक हिंदी की व्यापक भूमिका पर डॉ. मनीषा त्रिपाठी का विशेष आलेख
रायगढ़। हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी भाषा के महत्व, उसकी अभिव्यक्ति क्षमता और बदलते तकनीकी दौर में उसकी बढ़ती भूमिका को लेकर डॉ. मनीषा त्रिपाठी, प्रधानपाठक, शासकीय रविशंकर प्राथमिक शाला रायगढ़ ने अपने विचार साझा करते हुए हिंदी को अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बताया है। उन्होंने हिंदी की सहजता, सरलता और राष्ट्रीय एकता में उसकी भूमिका को रेखांकित करते हुए इसे जन-जन से जुड़ी भाषा बताया।

प्रकृति और मानव अनुभूति से जुड़ी है भाषा
हिंदी भाषा प्रकृति प्रदत्त और सार्वभौमिक है। जिस प्रकार जीव-जंतुओं को स्थलीय आहट, जलतरंग अथवा वायु वेग से उत्पन्न ध्वनियों की अनुभूति होती है, उसी प्रकार मानव जन्म से ही मातृभाषा के स्वर को अनुभव करता है। ये ध्वनियां और अनुभूतियां हिंदी भाषा के अतिरिक्त अन्य किसी भाषा में उसी सहजता से लिपिबद्ध नहीं हो सकतीं। यही कारण है कि हिंदी भाषा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है।
अभिव्यक्ति मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति
अभिव्यक्ति मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जो परस्पर विचारों के विनिमय का माध्यम बनती है। अभिव्यक्ति का माध्यम कोई भी भाषा या बोली हो सकती है, लेकिन राष्ट्रभाषा हिंदी में की गई अभिव्यक्ति संपूर्णता से युक्त होती है।
डिजिटल क्रांति हिंदी के लिए बड़ा अवसर
हर देश और हर भाषा के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जो उन्हें चिरकाल के लिए बदल देते हैं। विभिन्न स्तरों पर प्रयास लगातार चलते रहते हैं, लेकिन हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल क्रांति एक ऐसा अवसर है, जिसे यदि प्रभावी ढंग से अपनाया जाए तो निश्चित रूप से बड़ी छलांग लगाई जा सकती है।
कोरोना काल में नई तकनीक ने हिंदी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऑनलाइन पुस्तकों के प्रकाशन ने जहां पाठकों तक पहुंच को आसान और सरल बनाया, वहीं नवलेखकों को कम लागत में अपनी पुस्तकें तैयार करवाने की सुविधा भी मिली।
यू-ट्यूब, ब्लॉग और सोशल मीडिया ने बढ़ाई पहुंच
कोरोना काल में एक ओर कवि सम्मेलन और सेमिनार जैसे मंच प्रभावित हुए, वहीं दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी ने हिंदी के लिए नए अवसर उपलब्ध कराए। यू-ट्यूब, ब्लॉग, फेसबुक और वाट्सऐप जैसे माध्यम हिंदी को आम आदमी तक सरल और सुगम तरीके से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
हिंदी में सॉफ्टवेयर बनाने के लिए भी निरंतर प्रयास की आवश्यकता है। वित्तीय संसाधनों के साथ हिंदी प्रेमी और तकनीक दक्ष युवा इस दिशा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकते हैं।
न्यायिक अभिव्यक्ति में हिंदी का व्यापक महत्व
यदि न्यायिक अभिव्यक्ति हिंदी भाषा के माध्यम से होगी तो इससे न केवल न्यायिक प्रणाली की गरिमा बढ़ेगी, बल्कि हिंदी भाषा भी अपने वैशिष्ट्यपूर्ण गुणों के कारण नए आयाम स्थापित करेगी।
न्यायालय के कार्यों में हिंदी के माध्यम से अभिव्यक्ति न होने के कारण कई बार विषय के मर्म को समझने में अभाव उत्पन्न हो जाता है। इससे विधि विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं तथा न्यायिक अधिकारियों के मध्य विभ्रम की स्थिति निर्मित हो सकती है, जिसकी क्षति अंततः वादी को होती है।
अंग्रेजी भाषा में न्यायिक अभिव्यक्ति साधन मात्र है। श्रेष्ठ साध्य के लिए साधन का भी श्रेष्ठ होना आवश्यक है और यह श्रेष्ठता राष्ट्रभाषा हिंदी प्रदान करती है।
हिंदी में न्यायिक कार्य आमजन को देगा सहजता
न्याय के मर्म को आत्मसात करने के लिए न्यायिक कार्य हिंदी में संपादित करना अनिवार्य होना चाहिए। यदि यह कार्यरूप में परिणित हो जाए तो न्यायिक अभिव्यक्ति में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग कर लोकत्व का संरक्षण और भी अपरिहार्य हो जाता है।
हिंदी भाषा में अभिव्यक्ति होने से वादी-प्रतिवादी न्यायिक अधिकारी के समक्ष अपने हृदय की पीड़ा और कठिनाइयों को विवेकपूर्ण विचारों के माध्यम से सहजता से व्यक्त कर सकेंगे तथा न्यायिक कार्यवाही को भी आसानी से ग्राह्य कर सकेंगे।
न्यायिक अभिव्यक्ति हिंदी में होने के फलस्वरूप आमजन तथा नागरिकों पर विधिक ज्ञान का सीधा लाभ और प्रभाव स्वाभाविक रूप से दिखाई देगा।
राष्ट्रीय एकता की मजबूत कड़ी है हिंदी
राष्ट्रीय एकता में भी हिंदी का अनुपम योगदान है। हिंदी भारतीय संस्कृति की पोषक भाषा है। हिंदी भाषा ने भारत को एक सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें भावों के संप्रेषण में कोई बाधा नहीं आती।
हिंदी सबसे मीठी, सहज और सरल भाषा है। यही सहजता इसे आमजन के करीब लाती है और देश के अलग-अलग हिस्सों के लोगों के बीच संवाद तथा भावनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम बनाती है।
हिंदी के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प
हिंदी दिवस हमें अपनी भाषा के महत्व को समझने और उसके संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर देता है। हिंदी को केवल बोलचाल तक सीमित न रखते हुए इसके लेखन, पठन और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना आवश्यक है।
हमारा यह कर्तव्य है कि राष्ट्रभाषा हिंदी को सच्चे हृदय से अपनाएं, हिंदी बोलें, लिखें, पढ़ें और इसके प्रचार-प्रसार में अपना बहुमूल्य योगदान दें।
लेखिका का परिचय
डॉ. मनीषा त्रिपाठी
प्रधानपाठक, शासकीय रविशंकर प्राथमिक शाला
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित




