सुंदरगढ़ (ओडिशा)। भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित श्रावण मास में देशभर के शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इसी आस्था और भक्ति का एक प्रमुख केंद्र है घोघड़ धाम, जो ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले में कांसबहाल के निकट स्थित एक प्रसिद्ध शिवपीठ है। सावन के प्रत्येक सोमवार को यहां हजारों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा कर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।
छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
पश्चिम ओडिशा का यह प्राचीन शिव मंदिर केवल स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भगवा वस्त्र पहने कांवड़िए “बोल बम” के जयघोष के साथ भगवान शिव के दर्शन के लिए पैदल यात्रा करते हैं।
वेदव्यास से शुरू होती है कांवड़ यात्रा
घोघड़ धाम में जलाभिषेक के लिए श्रद्धालु अपनी यात्रा वेदव्यास धाम से शुरू करते हैं। मान्यता है कि वेदव्यास धाम ऋषि वेदव्यास की तपोभूमि है। यहां शंख, कोयल और गुप्त सरस्वती नदियों के संगम से पवित्र जल लेकर श्रद्धालु लगभग 20 किलोमीटर की पदयात्रा कर कांसबहाल स्थित घोघड़ मंदिर पहुंचते हैं।
रास्ते में भक्तों के लिए नि:शुल्क सेवा
वेदव्यास से घोघड़ तक के मार्ग में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा कांवड़ियों के लिए नि:शुल्क भोजन, पेयजल, विश्राम और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था की जाती है। कई स्थानों पर भजन संध्या और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। घोघड़ धाम परिसर में भी सावन के दौरान श्रद्धालुओं के लिए खान-पान और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
मंदिर परिसर में कई देवी-देवताओं के मंदिर
घोघड़ मंदिर परिसर में मुख्य शिव मंदिर के साथ भगवान हनुमान, मां दुर्गा, काली माता, भैरव बाबा, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, राम दरबार, गणेश जी, अयप्पा स्वामी और भैरवनाथ के मंदिर भी स्थित हैं। इससे श्रद्धालुओं को एक साथ कई धार्मिक स्थलों के दर्शन का अवसर मिलता है।
स्वयंभू शिवलिंग की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां भूमि से स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था। बताया जाता है कि 19वीं शताब्दी में गांगपुर राजवंश द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया और पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित नियुक्त किए गए। शुरुआत में यह एक छोटा मंदिर था, जो बाद में भक्तों के सहयोग से विकसित हुआ।
इस मंदिर में पूजा का अधिकार परंपरागत रूप से भूइंया जनजाति के पुरोहितों के पास है। वर्तमान में सात भूइंया परिवारों के पुरोहित मंदिर में पूजा सेवा कर रहे हैं।
1987 में हुआ मंदिर का पुनर्निर्माण
राजगांगपुर और कांसबहाल क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना के बाद मंदिर के विकास को गति मिली। वर्ष 1987 में मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसे वर्तमान स्वरूप दिया गया। 3 फरवरी 1987 को पुरी के शंकराचार्य द्वारा नवनिर्मित मंदिर का उद्घाटन किया गया। मंदिर की देखरेख और विकास के लिए वर्ष 1999 में श्री घोघडेश्वर महादेव ट्रस्ट की स्थापना की गई।
सावन में पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं की आस्था
श्रावण मास में घोघड़ धाम भक्तों से भर जाता है। ट्रस्ट प्रमुख हरिकिशन अग्रवाल के अनुसार, सावन के दौरान यहां पांच लाख से अधिक श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कई परिवार विवाह, मुंडन और जनेऊ जैसे धार्मिक संस्कार भी इसी मंदिर में कराते हैं।
सावन मेले की रहती है रौनक
पूरे सावन महीने में घोघड़ धाम में मेले का आयोजन होता है। यहां दूर-दराज से आए दुकानदार खान-पान, खिलौने, घरेलू सामान और अन्य वस्तुओं की दुकानें लगाते हैं। पुलिस प्रशासन और ट्रस्ट मिलकर श्रद्धालुओं की सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं और भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था संभालते हैं।




