‘युवा तुर्क’ से जननायक तक: सत्ता से बड़ा रहा जमीर, सादगी और समाजवाद की मिसाल बने चंद्रशेखर

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जयंती (birth anniversary) पर याद किया गया वह नेता, जिसने प्रधानमंत्री (Prime Minister) पद से ज्यादा जनता (public) के भरोसे को महत्व दिया

17 अप्रैल की सुबह जब देश Chandra Shekhar को याद करता है, तो वह सिर्फ एक पूर्व प्रधानमंत्री (Prime Minister) को नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर को नमन करता है, जिसमें राजनीति का अर्थ सेवा और संघर्ष था। उत्तर प्रदेश के बलिया के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे, लेकिन जमीन से उनका जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ। संसद ने उन्हें ‘युवा तुर्क’ कहा, जबकि गांव के लोगों ने उन्हें अपना नेता माना।

समाजवाद (socialism) की जड़ें किताबों में नहीं, गांव-गरीब और मजदूर की जिंदगी में थीं

चंद्रशेखर का समाजवाद (socialism) किसी सैद्धांतिक बहस का परिणाम नहीं था, बल्कि गांव, खेत और मजदूरों के जीवन से निकला विचार था। 1950 के दशक में Praja Socialist Party से जुड़कर उन्होंने राजनीति की शुरुआत की और ‘आखिरी व्यक्ति तक विकास’ का नारा दिया। 1964 में राज्यसभा पहुंचने के बाद भी उन्होंने आम जनता के मुद्दों को ही अपनी राजनीति का केंद्र बनाए रखा।

आपातकाल (Emergency) में जेल चुनी, लेकिन समझौता नहीं किया; लोकतंत्र (democracy) के लिए डटे रहे

1975 के Indian Emergency के दौरान जब लोकतंत्र (democracy) पर संकट आया, तब चंद्रशेखर ने सत्ता के सामने झुकने के बजाय जेल की राह चुनी। 19 महीनों तक कैद में रहने के बावजूद उनकी आवाज कमजोर नहीं हुई। बाहर आने के बाद उन्होंने टूटती हुई राजनीति को जोड़ने का काम किया और लोकतंत्र की मजबूती के लिए संघर्ष जारी रखा।

4000 किलोमीटर की पदयात्रा (padayatra) से देश को करीब से समझा, राजनीति को जमीन से जोड़ा

1983 में उनकी ऐतिहासिक पदयात्रा (padayatra) कन्याकुमारी से दिल्ली तक करीब 4000 किलोमीटर की थी। यह यात्रा सिर्फ एक राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि देश को समझने और जनता के दर्द को महसूस करने का प्रयास था। इस दौरान उन्होंने गांव, किसान और गरीबों की वास्तविक स्थिति को करीब से जाना।

प्रधानमंत्री (Prime Minister) रहते कठिन फैसले, सोना गिरवी रखकर भी देश की साख बचाई

1990 में प्रधानमंत्री बनने के बाद देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था। सीमित कार्यकाल के बावजूद उन्होंने बड़े फैसले लिए। विदेशी कर्ज के दबाव के बीच देश की साख बचाने के लिए सोना गिरवी रखने जैसा कठिन कदम उठाया, लेकिन राष्ट्रीय सम्मान से समझौता नहीं किया। यह उनके समाजवाद की व्यावहारिक सोच को दर्शाता है।

आज के दौर में बदला समाजवाद (socialism) का अर्थ, चंद्रशेखर की राजनीति बनी आदर्श

आज समाजवाद (socialism) जहां कई बार केवल नारे तक सीमित रह गया है, वहीं चंद्रशेखर के लिए यह एक जीवनशैली और संघर्ष का मार्ग था। उन्होंने कभी परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया और न ही जाति-धर्म की राजनीति को अपनाया। उनके लिए गरीब एक आंकड़ा नहीं, बल्कि संवेदनशील विषय था।

विरासत (legacy) आज भी जिंदा, नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

चंद्रशेखर की विरासत किसी एक दल या परिवार तक सीमित नहीं है। उनके पुत्र Neeraj Shekhar आज राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन चंद्रशेखर का समाजवाद किसी वंश का मोहताज नहीं। उनकी सोच आज भी हर उस व्यक्ति में जिंदा है, जो सच और जनता के हक के लिए खड़ा होता है।


लेखक:
हरहर शम्भू कुमार चौधरी (एमजे)
जिला ब्यूरोचीफ, खबरसार
मुख्य संपादक, सारांश दैनिक


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