— वर्षा मोटवानी, शिक्षिका, ओ.पी. जिंदल स्कूल
“जे को चवंदो झूलेलाल, तंहिंजा थिंदा बेड़ा पार”—यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सिंधी समाज की अटूट आस्था, विश्वास और जीवन-दर्शन का प्रतीक है। भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर में चेटीचंड एक ऐसा पावन पर्व है, जो सिंधी समुदाय के नववर्ष के साथ-साथ भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस के रूप में अत्यंत हर्ष, उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है।
इस दिन वातावरण भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है। श्रद्धालु बहाराणा साहिब की सजीव झांकी के साथ जल स्रोतों की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। भजन, कीर्तन और पारंपरिक नृत्य पूरे परिवेश को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत कर देते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सामूहिक एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक गौरव का भी जीवंत उत्सव है।
सिंधी समाज अपनी समृद्ध परंपराओं के संरक्षण के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। व्यापार, उद्योग और उद्यमिता के क्षेत्र में उनका योगदान भारतीय अर्थव्यवस्था को निरंतर सुदृढ़ करता है। इस समाज के पुरुष और महिलाएँ समान रूप से परिश्रमी, दूरदर्शी और आत्मनिर्भर हैं।
भारत का विभाजन की त्रासदी के बाद भी, विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने अदम्य साहस और अटूट संकल्प के बल पर न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बने।
आज के तेजी से बदलते समय में चेटीचंड हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने, एकता बनाए रखने और परिश्रम के मार्ग पर अग्रसर रहने की प्रेरणा देता है। यह पर्व सिखाता है कि आस्था और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।
निस्संदेह, चेटीचंड केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता को समृद्ध करने तथा राष्ट्र निर्माण में जीवंत भूमिका निभाने वाली एक प्रेरणादायक गाथा है।

