10 साल से मुआवजे के लिए भटक रहा किसान, कलेक्टर जनदर्शन में छलका दर्द; पीएमओ तक शिकायत के बाद भी नहीं मिला हक

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रिपोर्ट: अभिषेक कुमार पाण्डेय
जिला संवाददाता, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक: 18 अगस्त 2026

जमीन चली गई, मुआवजे का अब भी इंतजार

बिलासपुर। जमीन चली गई, लेकिन मुआवजा आज तक नहीं मिला। एक-दो महीने या एक-दो साल नहीं, बल्कि करीब 10 साल से एक किसान अपने हक की रकम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। आवेदन पर आवेदन देने और अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखने के बावजूद मामला लंबित बताया जा रहा है। आखिरकार किसान ने कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचकर अपनी पीड़ा सामने रखी।

रतनपुर क्षेत्र की जमीन से जुड़ा मामला

मामला रतनपुर क्षेत्र की जमीन से जुड़ा बताया जा रहा है। किसान के मुताबिक खसरा नंबर 883/19 और 883/20 में उसकी हिस्सेदारी है। उसका दावा है कि खसरा नंबर 883/19 की मुआवजा राशि अब तक नहीं मिली है, जबकि खसरा नंबर 883/20 की करीब दो लाख रुपये की राशि भी लंबित है।

किसान का कहना है कि मुआवजे के लिए वह वर्षों से एसडीएम कार्यालय, कलेक्टर कार्यालय और संबंधित विभागीय अधिकारियों के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करता रहा है, लेकिन अब तक उसे राहत नहीं मिली।

दस साल से फाइलों में अटका मामला?

किसान की शिकायत ने भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि संबंधित भूमि का अधिग्रहण हुआ है और मुआवजा निर्धारित किया गया है, तो भुगतान में इतनी लंबी देरी क्यों हुई, यह जांच का विषय है।

भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 में भूमि अधिग्रहण, मुआवजा निर्धारण और प्रभावित परिवारों के अधिकारों से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में किसान का कहना है कि उसे लंबे समय से अपने वैधानिक हक के लिए भटकना पड़ रहा है।

पीएमओ तक पहुंची शिकायत, फिर भी नहीं मिली राहत

किसान के अनुसार उसने अपनी समस्या को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक भी शिकायत की थी। उसके मुताबिक मामले में जांच की प्रक्रिया भी हुई, लेकिन इसके बावजूद लंबित मुआवजे का भुगतान नहीं हो सका।

यदि किसान के दावे के अनुसार शिकायत की जांच के बाद भी मामला लंबित है, तो जांच के निष्कर्ष और उसके बाद की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण सवाल बन जाती है।

कैंसर से पीड़ित पिता, परिवार पर आर्थिक दबाव

किसान की परेशानी केवल जमीन और मुआवजे तक सीमित नहीं है। उसके पिता कैंसर से पीड़ित बताए जा रहे हैं। परिवार पहले से ही इलाज के खर्च का सामना कर रहा है। ऐसे में वर्षों से लंबित मुआवजे ने परिवार की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

किसान का कहना है कि बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना, आवेदन देना और अधिकारियों से गुहार लगाना अब उसके लिए बेहद कठिन हो चुका है। एक ओर पिता के इलाज की चिंता है, तो दूसरी ओर अपने हक की रकम के लिए वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है।

पटवारी पर जमीन मांगने का आरोप

मामले में किसान ने संबंधित पटवारी पर भी गंभीर आरोप लगाया है। किसान का दावा है कि कथित तौर पर मुआवजे के बदले अलग से जमीन की मांग की गई थी। उसका कहना है कि मांग पूरी नहीं करने के बाद उसका मामला और उलझ गया।

हालांकि यह आरोप किसान की शिकायत और उसके बयान पर आधारित हैं तथा इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और किसी भी तरह की अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदारी तय की जा सके।

कलेक्टर जनदर्शन में रखी अपनी समस्या

इसी उम्मीद के साथ किसान मंगलवार को कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचा और कलेक्टर श्री संजय अग्रवाल के समक्ष अपनी समस्या रखी। अपनी वर्षों पुरानी परेशानी बताते हुए किसान भावुक भी हो गया।

बताया गया कि कलेक्टर ने मामले की जांच कराने और तथ्यों के आधार पर आवश्यक कार्रवाई का भरोसा दिया है। अब किसान को उम्मीद है कि मामले की जांच के बाद उसके लंबित मुआवजे का रास्ता साफ होगा।

प्रशासन के सामने पांच अहम सवाल

इस मामले में किसान की शिकायत के आधार पर कई सवाल सामने आए हैं—

  1. खसरा नंबर 883/19 की मुआवजा राशि अब तक क्यों लंबित है?
  2. खसरा नंबर 883/20 की बताई जा रही करीब दो लाख रुपये की राशि का भुगतान क्यों नहीं हुआ?
  3. वर्षों पहले आवेदन दिए जाने के बावजूद मामले का अंतिम निराकरण क्यों नहीं हुआ?
  4. पीएमओ स्तर तक शिकायत पहुंचने और जांच के बाद भी किसान को राहत क्यों नहीं मिली?
  5. पटवारी पर लगाए गए जमीन मांगने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी?

अब जांच और कार्रवाई पर टिकी उम्मीद

यह मामला केवल एक किसान के लंबित मुआवजे का नहीं, बल्कि सरकारी प्रक्रिया में आम नागरिक की शिकायत के समयबद्ध निराकरण की भी परीक्षा है। किसान के मुताबिक उसकी जमीन चली गई, लेकिन मुआवजा आज भी लंबित है। परिवार में गंभीर बीमारी और आर्थिक दबाव के बीच वह करीब एक दशक से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है।

अब निगाह प्रशासन की जांच और आगे की कार्रवाई पर है। क्या 10 साल से लंबित मुआवजे का रास्ता खुलेगा? क्या पटवारी पर लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या किसान को आखिरकार उसका वैधानिक हक मिल पाएगा?

दस साल के इंतजार के बाद किसान की उम्मीद अब प्रशासन की जांच पर टिकी है।

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