20 हजार वर्गफीट जमीन से जुड़े मामले में 16 अक्टूबर को फौती प्रतिवेदन और 19 अक्टूबर को मृत्यु प्रमाण पत्र जारी होने का दावा; खुलासे के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर SDM और जिला प्रशासन से जवाब की मांग
बिलासपुर। शहर से लगे सेंधरी क्षेत्र की करीब 20 हजार वर्गफीट जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े ने राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल फौती नामांतरण की तारीख को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र 19 अक्टूबर को जारी हुआ, जबकि तत्कालीन पटवारी नवीन त्रिपाठी द्वारा 16 अक्टूबर को ही फौती नामांतरण का प्रतिवेदन तैयार किए जाने का दावा किया जा रहा है। यदि दस्तावेजों में दर्ज ये तारीखें सही हैं, तो फौती प्रक्रिया की वैधानिकता और उसके आधार की जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
16 अक्टूबर को प्रतिवेदन, 19 अक्टूबर को मृत्यु प्रमाण पत्र
मामले में सामने आए दस्तावेजों को लेकर दावा है कि 16 अक्टूबर को तत्कालीन पटवारी नवीन त्रिपाठी ने फौती नामांतरण संबंधी प्रतिवेदन तैयार किया। इसके तीन दिन बाद यानी 19 अक्टूबर को संबंधित व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हुआ। यही तारीखों का अंतर अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। हालांकि, इस विसंगति के पीछे वास्तविक कारण क्या था, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
फौती नामांतरण की प्रक्रिया पर उठे सवाल
फौती नामांतरण सामान्यतः किसी खातेदार की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों के नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज करने की प्रक्रिया है। ऐसे में मृत्यु से पहले तैयार बताए जा रहे फौती प्रतिवेदन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि दस्तावेजों में यही तारीखें दर्ज हैं, तो यह पता लगाया जाना जरूरी है कि प्रतिवेदन किस आधार पर तैयार किया गया और उस समय पटवारी के पास मृत्यु से संबंधित कौन-से दस्तावेज या प्रमाण उपलब्ध थे।
20 हजार वर्गफीट जमीन और कथित बंदरबांट का मामला
सेंधरी की जमीन का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह करीब 20 हजार वर्गफीट के भूखंड से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायत में जमीन के कथित फर्जीवाड़े और बंदरबांट के आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में फौती नामांतरण से जुड़े रिकॉर्ड, आवेदन, प्रतिवेदन, राजस्व अभिलेख और संबंधित दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार हुई थी या नहीं।
कार्रवाई को लेकर SDM और जिला प्रशासन से सवाल
मामला सामने आने के बाद अब बिलासपुर SDM और जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि यदि दस्तावेजों में मृत्यु प्रमाण पत्र से तीन दिन पहले फौती प्रतिवेदन तैयार किए जाने की बात सही है, तो इसकी विभागीय जांच क्यों नहीं की गई? तत्कालीन पटवारी की भूमिका की जांच और जिम्मेदारी तय करने को लेकर प्रशासन की ओर से अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, यह भी सार्वजनिक होना चाहिए।
क्या जांच में सामने आएगा पूरा राजस्व रिकॉर्ड?
इस मामले में केवल पटवारी के प्रतिवेदन की तारीख ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे राजस्व रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। फौती आवेदन कब प्रस्तुत हुआ, किसके द्वारा दिया गया, उसके साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए, प्रतिवेदन किस आधार पर तैयार हुआ और नामांतरण की प्रक्रिया में किन अधिकारियों की भूमिका रही—इन सभी बिंदुओं की जांच से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
आम लोगों के लिए अलग और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम?
मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है। आम नागरिकों को फौती नामांतरण जैसे मामलों में दस्तावेजी प्रक्रिया और सत्यापन से गुजरना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी मामले में मृत्यु प्रमाण पत्र जारी होने से पहले ही फौती प्रतिवेदन तैयार होने की बात सही साबित होती है, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि ऐसी स्थिति कैसे बनी और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है।
प्रशासन की जांच से ही साफ होगी तस्वीर
फिलहाल उपलब्ध आरोपों और तारीखों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन दस्तावेजों में बताई जा रही तारीखों के बीच का अंतर इतना महत्वपूर्ण है कि इसकी निष्पक्ष और रिकॉर्ड-आधारित जांच जरूरी नजर आती है। संबंधित पटवारी और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।
अब निगाह प्रशासन के अगले कदम पर
सेंधरी जमीन मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला प्रशासन पूरे राजस्व रिकॉर्ड की जांच कर जिम्मेदारी तय करेगा? यदि दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा या नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। फिलहाल इस मामले में प्रशासन की ओर से आधिकारिक जांच या कार्रवाई को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है।
रिपोर्ट: अभिषेक कुमार पाण्डेय, रिपोर्टर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
