खरसिया में ‘सिस्टम’ का भ्रष्टाचार: 9.5 लाख के तालाब गहरीकरण के नाम पर सरकारी खजाने की खुली लूट, कैमरे से मुंह छिपाकर भागे जिम्मेदार

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मंगलेश डनसेना ✍️

खरसिया@दैनिक खबर सार :- विकास और ग्रामीण उत्थान के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत क्या है, इसकी पोल खरसिया तहसील के ग्राम पंचायत गीधा स्थित कोड़ाभाटा मोहल्ले में खुल रही है। यहां विकास कार्यों के नाम पर सरकारी खजाने की खुली लूट का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। करीब साढ़े नौ लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से स्वीकृत ‘मगरसागर तालाब’ के गहरीकरण प्रोजेक्ट को भ्रष्टाचार की दीमक चाट रही है। धरातल पर काम के नाम पर केवल लीपापोती की जा रही है, जबकि कागजों में फर्जी बिलिंग के जरिए लाखों के वारे-न्यारे करने की पूरी बिसात बिछ चुकी है।

मौके पर जाकर की गई पड़ताल में पंचायत के इस बहुचर्चित विकास कार्य की हकीकत खुलकर सामने आ गई। नियमानुसार तालाब गहरीकरण के कार्य में कम से कम छह इंच या उससे अधिक की खुदाई होनी चाहिए, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। मौके पर इंची टेप से की गई माप में यह साफ नजर आया कि गहराई के नाम पर सिर्फ ऊपरी मिट्टी को खुरचा गया है और ट्रैक्टरों के जरिए मिट्टी समतल करने का दिखावा हो रहा है। लाखों रुपये का बजट होने के बावजूद जमीन पर एक रुपये का भी ठोस काम नहीं दिख रहा है, जो सीधे तौर पर जनता के पैसे को अपनी बपौती समझकर उड़ाने का दुस्साहस है।

भ्रष्टाचार की इस पटकथा को बेहद शातिर तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। सरकारी नियमों के तहत किसी भी निर्माण स्थल पर कार्य की जानकारी, लागत और कार्यकारी एजेंसी का नाम दर्शाने वाला सूचना बोर्ड लगाना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद, काम अंतिम चरण में पहुंचने के बाद भी मौके से सूचना बोर्ड पूरी तरह नदारद है। ग्रामीणों को योजना की वास्तविक लागत और नियमों की भनक तक न लगे, इसके लिए जानबूझकर पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह भी एक कड़वा सच है कि पूर्व में भारी अनियमितताओं की शिकायत के बाद इस काम को बीच में ही रोक दिया गया था। लेकिन, किन दबावों या ‘खास कारणों’ से शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत वापस ली और बिना कार्यप्रणाली सुधारे उसी पुराने ढर्रे पर काम दोबारा शुरू कर दिया गया, यह अपने आप में जांच का एक बड़ा विषय है।

इस पूरे गोलमाल में रोजगार सहायक और कार्य प्रभारी (मैट) की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध नजर आ रही है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि इन जिम्मेदारों का पुराना रिकॉर्ड भी ऐसे ही विवादों से घिरा रहा है। मामले की गंभीरता तब और पुख्ता हो गई जब मौके पर मौजूद रोजगार सहायक से इस दो नंबरी काम को लेकर कैमरे के सामने पक्ष जानना चाहा गया। सवालों का सामना करने और सच्चाई बताने के बजाय, वे घबराहट में मुंह छिपाते हुए और फोन पर व्यस्त होने का नाटक करते हुए वहां से रफूचक्कर हो गए। उनका यह संदिग्ध रवैया खुद उनके इस भ्रष्टाचार में संलिप्त होने की गवाही दे रहा है। इसके साथ ही इलाके में दबी जुबान यह चर्चा भी जोरों पर है कि इस पूरे मामले को रफा-दफा करने और अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए विभाग के किसी उच्चाधिकारी तक एक मोटी रकम पहुंचाकर ‘सेटलमेंट’ कर लिया गया है।

मगरसागर तालाब का यह मामला पंचायत स्तर पर जड़ जमा चुके संस्थागत भ्रष्टाचार का एक जीता-जागता प्रमाण है। जिम्मेदार अधिकारियों का कैमरे से भागना और उच्चाधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी इस बात का पुख्ता संकेत है कि इस पूरे खेल में कई बड़े चेहरे शामिल हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के आला अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागकर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई करते हैं, या फिर सरकारी खजाने की लूट का यह मामला भी विभागीय फाइलों और कथित ‘सेटलमेंट’ के बोझ तले हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।

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