स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सिमटता बचपन, रील्स और सोशल मीडिया की बढ़ती लत पर गंभीर सवाल

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— एच.पी. जोशी

“रील दोबारा देखी जा सकती है, लेकिन बीता हुआ बचपन दोबारा नहीं आता।”

एक समय था जब माता-पिता बच्चों को शराब, सिगरेट और दूसरे नशीले पदार्थों से दूर रखने को लेकर चिंतित रहते थे। आज बच्चों के सामने एक नया डिजिटल खतरा खड़ा है। यह किसी बोतल में बंद होकर घर नहीं आता, इसकी कोई गंध नहीं होती और कई बार माता-पिता ही इसे बच्चे के हाथ में सौंपकर निश्चिंत हो जाते हैं।

यह है—स्मार्टफोन।

हालांकि स्मार्टफोन या इंटरनेट अपने आप में समस्या नहीं हैं। असली चिंता उस डिजिटल वातावरण को लेकर है, जिसमें बच्चा कुछ मिनट के मनोरंजन के लिए स्क्रीन खोलता है और फिर एक के बाद एक वीडियो देखने के सिलसिले में उलझता चला जाता है।

एक रील खत्म होती है और दूसरी अपने आप सामने आ जाती है। फिर तीसरी और चौथी।

धीरे-धीरे खेल, किताब, नींद, परिवार से बातचीत, रचनात्मक गतिविधियां और प्रकृति के साथ बिताया जाने वाला समय स्क्रीन के सामने खपने लगता है।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चा मोबाइल कितनी देर चला रहा है। बड़ा सवाल यह है कि उस स्क्रीन टाइम के बदले वह अपने बचपन के कौन-कौन से अनुभव खो रहा है?

स्मार्टफोन चलाना और स्मार्ट होना अलग-अलग बातें

हमने तकनीक को “स्मार्ट” कहना शुरू किया और कहीं न कहीं उसके उपयोगकर्ता को भी स्मार्ट समझने लगे। लेकिन अत्याधुनिक मोबाइल चलाना और विवेकपूर्ण तरीके से उसका इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।

किसी बच्चे के पास महंगा स्मार्टफोन हो सकता है। उसे सोशल मीडिया के तमाम ट्रेंड मालूम हो सकते हैं और वह दर्जनों ऐप इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन अगर वह स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा, हर नोटिफिकेशन पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है, रील्स देखना रोक नहीं पाता या नींद और पढ़ाई की कीमत पर लगातार स्क्रीन से जुड़ा रहता है, तो केवल तकनीकी दक्षता को समझदारी नहीं कहा जा सकता।

तकनीकी जानकारी और मानसिक परिपक्वता एक ही चीज नहीं हैं।

रील्स केवल मनोरंजन नहीं, ध्यान खींचने वाली व्यवस्था भी हैं

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं की पसंद और व्यवहार के आधार पर अगली सामग्री सुझाने वाले जटिल सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ता को उसके लिए प्रासंगिक और आकर्षक सामग्री उपलब्ध कराना है, लेकिन इसका एक परिणाम यह भी हो सकता है कि व्यक्ति लंबे समय तक स्क्रीन पर बना रहे।

शॉर्ट वीडियो तेज होते हैं, लगातार बदलते हैं और एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा सामने आ जाता है। उपयोगकर्ता को अगली सामग्री खोजने के लिए विशेष प्रयास भी नहीं करना पड़ता।

एक वयस्क अपने व्यवहार को समझकर उस पर नियंत्रण करने की कोशिश कर सकता है। लेकिन बच्चों से उसी स्तर का आत्मनियंत्रण अपेक्षित करना आसान नहीं है, क्योंकि उनका मानसिक और भावनात्मक विकास अभी जारी रहता है।

यहीं से सोशल मीडिया का विषय केवल व्यक्तिगत पसंद का नहीं रह जाता, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और स्वस्थ विकास का मुद्दा भी बन जाता है।

बचपन का खोया हुआ समय वापस नहीं आता

बच्चे के विकास में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। खेल के मैदान में बच्चा सहयोग और प्रतिस्पर्धा सीखता है। असफलता उसे धैर्य सिखाती है। परिवार उसे रिश्तों की अहमियत समझाता है। प्रकृति उसके भीतर जिज्ञासा जगाती है और किताबें उसकी कल्पना का विस्तार करती हैं।

अगर इन अनुभवों की जगह लगातार स्क्रीन आधारित मनोरंजन ले ले, तो नुकसान केवल स्क्रीन टाइम बढ़ने तक सीमित नहीं रह सकता।

हमें यह भी देखना होगा कि मोबाइल के सामने बिताए गए उन घंटों में बच्चे ने क्या-क्या नहीं किया।

क्या उसने दोस्तों के साथ खेला?

क्या उसने किताब पढ़ी?

क्या उसने माता-पिता से खुलकर बात की?

क्या उसने कुछ नया बनाया या सीखा?

या फिर उसका अधिकांश खाली समय एक के बाद एक वीडियो देखने में चला गया?

बच्चों का डिजिटल वातावरण भी बाल अधिकारों का विषय

बच्चों के अधिकारों की चर्चा अब केवल शिक्षा, पोषण और सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल युग ने इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करता है। न्यायपालिका ने समय के साथ जीवन के अधिकार की व्याख्या गरिमा और जीवन की गुणवत्ता जैसे व्यापक पहलुओं से भी जोड़ी है। वहीं अनुच्छेद 21A बच्चों के शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

इसके अलावा अनुच्छेद 39(e) और 39(f) राज्य की नीति को बच्चों की कोमल आयु के दुरुपयोग को रोकने तथा उनके स्वस्थ विकास, स्वतंत्रता और गरिमा के लिए उचित अवसर और सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में निर्देशित करते हैं।

डिजिटल युग में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह बनता जा रहा है कि बच्चों को उपलब्ध डिजिटल वातावरण उनके स्वस्थ विकास और गरिमा के अनुकूल किस हद तक है।

वैश्विक स्तर पर भी बढ़ी चिंता

डिजिटल दुनिया केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में बच्चे इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच बड़े हो रहे हैं। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार अभिसमय (Convention on the Rights of the Child) की प्रासंगिकता डिजिटल युग में और बढ़ गई है।

इसके तहत बच्चों के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देने, उन्हें सूचना और मीडिया तक पहुंच देने के साथ-साथ उनके कल्याण के लिए हानिकारक सामग्री से सुरक्षा तथा दुर्व्यवहार और शोषण से बचाव जैसे सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं।

इसका मतलब बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह काट देना नहीं है। आवश्यकता ऐसी डिजिटल व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें बच्चों की भागीदारी के साथ उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

सोशल मीडिया को लेकर न्यायिक और नीतिगत चिंता

नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा का विषय भारत में भी सार्वजनिक विमर्श और न्यायिक चर्चा का हिस्सा बन चुका है। सितंबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग से जुड़े सुरक्षा उपायों की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगे जाने की बात सामने आई।

हालांकि किसी याचिका पर सरकार से जवाब मांगा जाना अपने आप में किसी अंतिम प्रतिबंध या अंतिम न्यायिक निष्कर्ष का अर्थ नहीं है। लेकिन यह घटनाक्रम इस ओर संकेत जरूर करता है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा अब केवल घर की चारदीवारी के भीतर का विषय नहीं रह गई है।

यह बाल अधिकार, सार्वजनिक नीति और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है।

क्या केवल माता-पिता जिम्मेदार हैं?

बच्चों के मोबाइल उपयोग की चर्चा होते ही अक्सर पूरी जिम्मेदारी माता-पिता पर डाल दी जाती है। निश्चित रूप से परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन समस्या को केवल पारिवारिक अनुशासन तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा।

एक ऐसे डिजिटल वातावरण में, जहां प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता की रुचि बनाए रखने के लिए लगातार नई सामग्री उपलब्ध कराते हैं, बच्चों की सुरक्षा के लिए कई स्तरों पर जिम्मेदारी जरूरी है।

परिवार की भूमिका:
बच्चों की उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम के स्पष्ट नियम बनाए जाएं और माता-पिता स्वयं भी उनका पालन करें।

विद्यालय और समाज की भूमिका:
बच्चों को केवल डिजिटल तकनीक चलाना नहीं, बल्कि डिजिटल अनुशासन, साइबर सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार भी सिखाया जाए।

सरकार और प्लेटफॉर्म की भूमिका:
नाबालिगों की गोपनीयता, आयु-अनुकूल डिजिटल डिजाइन, अभिभावकीय नियंत्रण और हानिकारक सामग्री से सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय विकसित किए जाएं।

जिस बच्चे की निर्णय लेने की क्षमता अभी विकसित हो रही है, उसकी पूरी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी पर नहीं छोड़ी जा सकती।

समाधान मोबाइल छीनना नहीं, डिजिटल विवेक विकसित करना है

बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर करना न व्यावहारिक है और न ही आवश्यक। आने वाले समय में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन डिजिटल तकनीक से और अधिक जुड़ेंगे।

इसलिए बच्चों को दो चीजें एक साथ सिखानी होंगी—

Technology Skills और Self-Control।

उन्हें समझना होगा कि हर नोटिफिकेशन जरूरी नहीं है। हर वायरल वीडियो उपयोगी नहीं है। हर इन्फ्लुएंसर आदर्श नहीं है। हर ट्रेंड का हिस्सा बनना आवश्यक नहीं है।

सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चा यह सीख सके कि कब फोन उठाना है और कब फोन नीचे रख देना है।

सबसे प्रभावी पैरेंटल कंट्रोल माता-पिता का अपना व्यवहार

बच्चे केवल हमारी बातें सुनकर नहीं सीखते। वे हमारे व्यवहार को देखकर भी सीखते हैं।

यदि भोजन की मेज पर माता-पिता लगातार फोन में व्यस्त हैं, बातचीत के बीच हर नोटिफिकेशन को प्राथमिकता मिलती है और घर का हर खाली समय स्क्रीन से भर दिया जाता है, तो बच्चे से डिजिटल अनुशासन की अपेक्षा करना मुश्किल होगा।

इसलिए बच्चों के डिजिटल अनुशासन की शुरुआत परिवार से ही होनी चाहिए।

घर में कुछ सरल नियम उपयोगी हो सकते हैं—

  • भोजन के समय फोन से दूरी।
  • सोने से पहले स्क्रीन बंद।
  • उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम की सीमा।
  • नियमित आउटडोर खेल।
  • परिवार के साथ बातचीत के लिए स्क्रीन-फ्री समय।
  • बच्चे के साथ पर्याप्त व्यक्तिगत समय।

सबसे प्रभावी डिजिटल डिटॉक्स किसी ऐप से नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार में बदलाव से शुरू होता है।

हमें तकनीक से नहीं, तकनीक की गुलामी से बचना है

यह लड़ाई स्मार्टफोन के खिलाफ नहीं है। यह अनियंत्रित उपयोग के खिलाफ है।

यह सोशल मीडिया को पूरी तरह बंद करने की मांग नहीं है। सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और स्वस्थ विकास की कीमत पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल न हो।

इंटरनेट को रोकना समाधान नहीं है। समाधान यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल दुनिया में प्रवेश करने वाले बच्चे की सुरक्षा, मानसिक स्वतंत्रता, गरिमा और विकास सुरक्षित रहें।

आज हमारे सामने अवसर है कि हम ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित करें, जहां तकनीक बच्चे की क्षमता बढ़ाए, उसका समय न निगले; उसे ज्ञान दे, उसका ध्यान न छीने; उसे दुनिया से जोड़े, लेकिन वास्तविक रिश्तों से दूर न करे।

क्योंकि बचपन जीवन का वह हिस्सा है जिसे दोबारा डाउनलोड नहीं किया जा सकता।

रील दोबारा देखी जा सकती है।

वीडियो दोबारा चलाया जा सकता है।

लेकिन बीता हुआ बचपन वापस नहीं आता।

इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—

“बच्चा कितनी रील्स देख रहा है?”

बल्कि सवाल यह होना चाहिए—

“रील्स देखते-देखते वह अपने जीवन से क्या खो रहा है?”

बच्चों के हाथ में तकनीक जरूर दीजिए, लेकिन यह सुनिश्चित कीजिए कि तकनीक उनके भविष्य पर कब्जा न कर ले।

— एच.पी. जोशी
(लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी)

लेखक परिचय: श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी ‘मानव अधिकार के अनछुए पहलू’ नामक ग्रंथ के लेखक हैं।

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