नई दिल्ली। गुटखा, खैनी, जर्दा और अन्य चबाने वाले तंबाकू उत्पादों को लेकर सामने आई एक नई वैश्विक स्टडी ने गंभीर स्वास्थ्य चिंता उजागर की है। इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (IHME) के विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 2023 में दुनिया भर में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल से अनुमानित 2.51 लाख लोगों की मौत हुई। अध्ययन के अनुसार, इससे जुड़े स्वास्थ्य बोझ का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित रहा, जिसमें भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।
यह विश्लेषण ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2023 का हिस्सा है और द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। शोध में वर्ष 1990 से 2023 तक 204 देशों और क्षेत्रों में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल और उससे जुड़े स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन किया गया।
10 देशों में केंद्रित रहा 90 फीसदी से अधिक स्वास्थ्य बोझ
अध्ययन के मुताबिक, चबाने वाले तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा 10 देशों में केंद्रित रहा। पुरुषों के मामले में इन देशों में भारत, बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, म्यांमार, अमेरिका, नेपाल, श्रीलंका, फिलीपींस और मेडागास्कर शामिल हैं।
महिलाओं के मामले में भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, म्यांमार, चीन, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और नेपाल में इसका स्वास्थ्य बोझ सबसे अधिक दर्ज किया गया।
भारत में सबसे ज्यादा चबाने वाले तंबाकू का इस्तेमाल
अध्ययन में भारत को चबाने वाले तंबाकू के सबसे अधिक उपयोगकर्ताओं वाला देश बताया गया है। अनुमान के अनुसार, भारत में करीब 10.5 करोड़ लोग चबाने वाले तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं।
गुटखा, खैनी और जर्दा जैसे उत्पादों का इस्तेमाल देश के कई हिस्सों में लंबे समय से किया जाता रहा है। अध्ययन के मुताबिक, इन उत्पादों की आसान उपलब्धता और अपेक्षाकृत कम कीमत भी इनके इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले कारकों में शामिल हैं।
दक्षिण एशिया में वैश्विक औसत से कई गुना ज्यादा इस्तेमाल
दक्षिण एशिया में तंबाकू के इस्तेमाल का स्तर वैश्विक औसत की तुलना में काफी अधिक पाया गया। अध्ययन के अनुसार, क्षेत्र में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी में तंबाकू इस्तेमाल की दर करीब 14.6 प्रतिशत रही, जबकि वैश्विक दर 3.9 प्रतिशत थी।
पुरुषों में इसका इस्तेमाल महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया। हालांकि, अलग-अलग देशों और आयु वर्गों में तस्वीर एक जैसी नहीं है। उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश में 30 वर्ष से अधिक उम्र के कई आयु वर्गों में महिलाओं में इस्तेमाल की दर पुरुषों से अधिक दर्ज की गई।
किन बीमारियों से जुड़ा है चबाने वाला तंबाकू?
शोधकर्ताओं ने चबाने वाले तंबाकू से जुड़े स्वास्थ्य नुकसान का आकलन छह प्रमुख स्वास्थ्य परिणामों के आधार पर किया। इनमें शामिल हैं—
- स्ट्रोक
- होंठ और मुंह का कैंसर
- खाने की नली यानी इसोफेगस का कैंसर
- गले के अन्य कैंसर
- स्वरयंत्र यानी लैरिंक्स का कैंसर
- नाक और गले के ऊपरी हिस्से का कैंसर
अध्ययन के अनुसार, स्वास्थ्य बोझ में स्ट्रोक का योगदान सबसे अधिक रहा। इसके बाद होंठ और मुंह के कैंसर का स्थान रहा।
1990 से 2023 के बीच स्वास्थ्य बोझ में 116 फीसदी वृद्धि
अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 1990 से 2023 के बीच चबाने वाले तंबाकू से जुड़े DALYs यानी बीमारी, विकलांगता और समय से पहले मौत से जुड़े कुल स्वास्थ्य बोझ में 116 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2023 में यह आंकड़ा करीब 64.8 लाख DALYs तक पहुंच गया।
दक्षिण एशिया में इसका प्रभाव और अधिक गंभीर दिखाई दिया। अध्ययन के अनुसार, होंठ और मुंह के कैंसर से जुड़े वैश्विक DALYs में चबाने वाले तंबाकू का योगदान 17.3 प्रतिशत रहा, जबकि दक्षिण एशिया में यह हिस्सेदारी बढ़कर 30.5 प्रतिशत तक पहुंच गई।
सिर्फ इस्तेमाल की दर से तय नहीं होता स्वास्थ्य नुकसान
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी देश में तंबाकू इस्तेमाल करने वालों की संख्या और उससे होने वाली कुल मौतों या बीमारी के बोझ के बीच सीधा संबंध हमेशा नहीं होता। बड़ी आबादी वाले देशों में इस्तेमाल की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद कुल प्रभावित लोगों की संख्या अधिक हो सकती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि वैश्विक स्तर पर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में चबाने वाले तंबाकू का इस्तेमाल अधिक रहा। उम्र बढ़ने के साथ इसके इस्तेमाल की दर में भी वृद्धि देखी गई।
हर देश के लिए अलग रणनीति की जरूरत
IHME की वरिष्ठ लेखिका और हेल्थ मेट्रिक्स साइंसेज विभाग की प्रोफेसर डॉ. इमैनुएला गाकिडोउ के मुताबिक, अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि चबाने वाले तंबाकू को नियंत्रित करने के लिए सभी देशों और आबादी पर एक जैसी रणनीति लागू करना पर्याप्त नहीं होगा।
उनके अनुसार, तंबाकू नियंत्रण और इसे छोड़ने से जुड़ी रणनीतियों में देश, उम्र और जेंडर के आधार पर इस्तेमाल के अलग-अलग पैटर्न को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी समझना होगा, जो अलग-अलग क्षेत्रों में तंबाकू के इस्तेमाल को प्रभावित करती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए बढ़ी चुनौती
नई स्टडी ऐसे समय सामने आई है जब दुनिया के कई देशों में तंबाकू सेवन को कम करने के लिए लंबे समय से अभियान चलाए जा रहे हैं। शोध के आंकड़े बताते हैं कि विशेष रूप से चबाने वाले और अन्य बिना धुएं वाले तंबाकू उत्पादों पर नियंत्रण, जागरूकता और छोड़ने में मदद करने वाली रणनीतियों को लेकर अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
डिस्क्लेमर: यह समाचार स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक शोध के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। किसी स्वास्थ्य समस्या, तंबाकू छोड़ने या उपचार संबंधी निर्णय के लिए योग्य चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

