रायगढ़@दैनिक खबर सार :- भ्रष्टाचार की दीमक किस कदर सरकारी तंत्र को खोखला कर रही है, इसकी एक खौफनाक और शर्मनाक बानगी छत्तीसगढ़ के रायगढ़ नगर निगम में देखने को मिली है। यह महज किसी बाबू की लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि ‘मैलाथियान पावडर’ की खरीदी के नाम पर रची गई एक ऐसी सुनियोजित आपराधिक साजिश है, जिसने निगम की पूरी कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। जिस ईमानदार सप्लायर ने निगम के आदेश का अक्षरशः पालन करते हुए लाखों का माल सौंपा, वह आज अपनी पाई-पाई को मोहताज है। वहीं, सिस्टम में बैठे सफेदपोशों की कागजी बाजीगरी देखिए कि बिना एक ग्राम माल सप्लाई किए ही किसी ‘अज्ञात’ की जेब में जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये डाल दिए गए। पिछले पांच सालों से न्याय की गुहार लगाती असली कंपनी की चीखें, नगर निगम की धूल फांकती फाइलों के नीचे बेरहमी से दबा दी गई हैं।
इस महाघोटाले की स्क्रिप्ट वर्ष 2021 में लिखी गई थी। तत्कालीन भ्रष्ट अधिकारियों के एक सिंडिकेट ने शहर की सफाई और स्वास्थ्य का ढिंढोरा पीटते हुए रायपुर की प्रतिष्ठित फर्म ‘कामधेनु फाइनेंशियल एडवाइजरी एलएलपी’ को मैलाथियान पावडर सप्लाई करने का अधिकृत वर्क ऑर्डर थमाया था। कंपनी ने अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारी निभाते हुए, बिना किसी विलंब के 4 लाख 99 हजार 982 रुपये की लागत वाले 400 बैग पावडर की पूरी खेप निगम के सुपुर्द कर दी। तत्कालीन अधिकारियों ने माल की बकायदा जांच की, उसे गोदाम में रखवाया और फर्म को अपने हस्ताक्षर वाली आधिकारिक ‘रिसीविंग’ (पावती) भी सौंप दी। नियमानुसार इसके तत्काल बाद भुगतान होना था, लेकिन यहीं से शुरू हुआ कमीशनखोरी और बंदरबांट का वह घिनौना खेल, जिसने पूरे निगम प्रशासन को दागदार कर दिया है।
माल सौंपने के अगले ही दिन से कामधेनु फाइनेंशियल एडवाइजरी एलएलपी अपने हक के पैसों के लिए निगम कार्यालय के चक्कर काट रही है। वर्ष 2021 से लेकर आज तक कंपनी ने अनगिनत पत्र लिखे, गुहार लगाई, लेकिन इस बहरे सिस्टम के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। अब जाकर इस पूरे तिलिस्म से पर्दा उठा है और जो कड़वा सच सामने आया है, वह किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी है। निगम के आला अधिकारी अब पूरी बेशर्मी से यह बेतुका तर्क दे रहे हैं कि इस सामग्री का भुगतान तो बहुत पहले ही किया जा चुका है! लेकिन सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि जब असली सप्लायर के बैंक खाते में एक रुपया तक नहीं पहुंचा, तो वह लाखों की भारी-भरकम रकम आखिर गई कहां? साफ है कि अधिकारियों ने एक फर्जी लाभार्थी खड़ा किया, फर्जी बिल लगाए और असली सप्लायर के हक का पूरा पैसा डकार लिया।
जैसे-जैसे इस ‘मैलाथियान घोटाले’ की परतें उधड़ रही हैं, भ्रष्टाचार का एक विशाल नेटवर्क बेनकाब हो रहा है। निगम के अंदरूनी सूत्रों और जानकारों का पुख्ता दावा है कि साल 2020 और 2021 के दौरान तत्कालीन अधिकारियों ने एक ही सामग्री की सप्लाई के नाम पर दो से तीन अलग-अलग चहेतों को फर्जी कार्यादेश जारी किए थे। यह पूरा चक्रव्यूह इसलिए रचा गया ताकि बिना सामग्री का भंडारण किए ही कागजों पर हेराफेरी करके सरकारी खजाने को चूना लगाया जा सके। जिन्होंने वास्तव में निगम को माल दिया, उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया और जिन ‘हवा-हवाई’ सप्लायरों का जमीन पर कोई वजूद ही नहीं था, उन्हें रातों-रात लाखों का भुगतान कर दिया गया।
इस खुली लूट पर जब निगम के जिम्मेदारों से जवाब मांगा गया, तो उनकी बौखलाहट और टालमटोल उनके चेहरे पर साफ नजर आई। संबंधित शाखा के प्रभारियों का यह हास्यास्पद और गैर-जिम्मेदाराना बयान कि “भुगतान तो हुआ है, लेकिन पैसा लेने वाला कोई और था,” सीधे तौर पर उनकी मिलीभगत को प्रमाणित करता है। क्या सरकारी खजाना कोई लावारिस संपत्ति है,
जिसे बिना दस्तावेजों के सत्यापन के किसी भी राह चलते के हाथों में सौंप दिया जाए? इस बेहद गंभीर और संगीन विषय पर जब रायगढ़ नगर निगम के आयुक्त बृजेश क्षत्रिय से उनका आधिकारिक पक्ष जानने का प्रयास किया गया,
तो उनके फोन की घंटी लगातार बजती रही, लेकिन उन्होंने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा। निगम के सर्वोच्च अधिकारी की यह रहस्यमयी चुप्पी इस बात की चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है। यदि इस पूरे फर्जीवाड़े की किसी स्वतंत्र एजेंसी से उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो जाए, तो रायगढ़ नगर निगम के कई कद्दावर चेहरों का बेनकाब होना और सलाखों के पीछे जाना तय है।




