जिस लॉ कॉलेज की अपनी छत नहीं थी, वहीं से निकला सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश

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रायगढ़ के ‘परस भैया’ की कहानी—कम संसाधनों से शुरू हुआ सफर देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा

रिपोर्टर: अभिषेक कुमार पाण्डेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

“पंख कट भी जाएं अगर यारों,
आदमी हौसलों से उड़ता है…”

रायगढ़। आज के दौर में जब बेहतर करियर के लिए युवा बड़े शहरों और प्रतिष्ठित संस्थानों की तलाश करते हैं, तब कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जो बताती हैं कि मंजिल तय करने के लिए सबसे जरूरी चीज संसाधन नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति होती है। रायगढ़ से निकलकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की यात्रा ऐसी ही प्रेरक कहानी है।

रायगढ़ में उन्हें स्नेह से ‘परस भैया’ कहकर पुकारने वाले लोग आज भी उनके संघर्ष के दिनों को याद करते हैं। जिस दौर में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की, उस समय न इंटरनेट था, न ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा और न ही आज जैसी आधुनिक शैक्षणिक व्यवस्था। जिस लॉ कॉलेज में वे पढ़ते थे, उसका अपना भवन तक नहीं था। कक्षाएं रात के समय म्युनिसिपल स्कूल के खाली कमरों में लगती थीं।

लेकिन सीमित सुविधाओं के बीच भी एक बड़ा सपना आकार ले रहा था।

एक छोटे शहर से शुरू हुई बड़ी कहानी

प्रशांत कुमार मिश्रा की शुरुआती पढ़ाई और रुचि का एक हिस्सा विज्ञान से जुड़ा था। वे बायोलॉजी के विद्यार्थी रहे। उनके परिचित बताते हैं कि वे पढ़ाई के सिलसिले में उनके पिता से बायोलॉजी पढ़ने आया करते थे।

परिवार और परिचितों के बीच उनकी छवि एक गंभीर और मेहनती विद्यार्थी की थी। पढ़ाई के साथ क्रिकेट भी उनके जीवन का हिस्सा था। दोस्तों के साथ मैदान में खेलने वाला यह युवक आगे चलकर देश की सर्वोच्च अदालत की बेंच तक पहुंचेगा, यह उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा।

उस दौर का रायगढ़ आज के रायगढ़ से काफी अलग था। उच्च शिक्षा के विकल्प सीमित थे और बड़े संस्थानों तक पहुंच आसान नहीं थी। इसके बावजूद प्रशांत मिश्रा ने परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया।

डॉक्टर बनने की दिशा से कानून की ओर मुड़ा सफर

शुरुआत में उनका रुझान चिकित्सा क्षेत्र की ओर था, लेकिन बाद में उन्होंने कानून को अपना पेशा बनाने का निर्णय लिया। रायगढ़ से कानून की पढ़ाई शुरू करने के बाद उन्होंने वकालत की दुनिया में कदम रखा।

उनकी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास किया। उच्च न्यायालय और आगे की न्यायिक यात्रा के लिए अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ जरूरी थी। छोटे शहर के माहौल में यह आसान चुनौती नहीं थी।

लेकिन उन्होंने इसका समाधान भी खुद तलाश लिया।

अंग्रेजी सीखने के लिए बनाया अपना समूह

प्रशांत मिश्रा ने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक छोटा English Speaking Group बनाया। इसमें आपस में अंग्रेजी में बातचीत करने का नियम था।

गलतियां होती थीं, शब्दों की कमी महसूस होती थी और वाक्य बनाने में कठिनाई आती थी, लेकिन अभ्यास लगातार जारी रहा। इसी तरह धीरे-धीरे भाषा पर पकड़ मजबूत होती गई।

यह प्रसंग बताता है कि उन्होंने किसी सुविधा का इंतजार करने के बजाय अपनी जरूरत के अनुसार खुद व्यवस्था तैयार की।

1987 में वकालत शुरू, दो साल बाद बदली दिशा

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1987 में उन्होंने रायगढ़ में वकालत शुरू की। लेकिन कुछ बड़ा करने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें ज्यादा समय तक एक ही जगह नहीं रोक सकी।

वर्ष 1989 में उन्होंने रायगढ़ से जबलपुर का रुख किया और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में वकालत शुरू की।

जबलपुर उस समय मध्य प्रदेश का प्रमुख न्यायिक केंद्र था। यहां देश के कई प्रतिष्ठित वकील प्रैक्टिस करते थे। ऐसे माहौल में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था।

लेकिन प्रशांत मिश्रा ने अपनी पहचान किसी बड़े संस्थान या नाम के सहारे नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और कानूनी समझ के आधार पर बनाई।

11 वर्षों की मेहनत ने तैयार किया अगला पड़ाव

जबलपुर में उन्होंने करीब 11 वर्षों तक वकालत की। अदालत में प्रभावी तर्क, कानून की गहरी समझ और लगातार तैयारी उनकी कार्यशैली का हिस्सा बनती गई।

फिर आया वर्ष 2000, जब मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ नया राज्य बना और बिलासपुर में नए हाई कोर्ट की स्थापना हुई।

यहीं उन्होंने एक बार फिर जोखिम उठाया।

जबलपुर में स्थापित हो चुकी अपनी प्रैक्टिस छोड़कर उन्होंने बिलासपुर आने का निर्णय लिया।

नई जगह, नई शुरुआत और तेजी से बढ़ती जिम्मेदारियां

बिलासपुर आने के बाद उनकी कानूनी प्रतिभा जल्द ही सामने आने लगी। मजबूत अंग्रेजी, कानून की गहरी समझ और अदालत में प्रभावी प्रस्तुति ने उन्हें न्यायिक क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई।

इसके बाद जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं।

वर्ष 2004 में वे अतिरिक्त महाधिवक्ता बने।

इसके बाद 2007 में छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता की जिम्मेदारी संभाली।

फिर न्यायिक क्षेत्र में उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव आया।

2009 में बने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायाधीश

वर्ष 2009 में प्रशांत कुमार मिश्रा को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

उस समय उनकी उम्र करीब 44 वर्ष थी।

जिस व्यक्ति ने कभी सीमित संसाधनों वाले लॉ कॉलेज में पढ़ाई की थी, वह अब न्याय की उस कुर्सी तक पहुंच चुका था, जिसे पाने का सपना देशभर के हजारों कानून विद्यार्थियों का होता है।

लेकिन यह सफर यहीं खत्म नहीं हुआ।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश से आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट तक

न्यायिक सेवा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी भी संभाली।

इसके बाद वर्ष 2021 में वे आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने।

यह उनके न्यायिक करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव था।

फिर आया वह क्षण, जिसने रायगढ़ से शुरू हुई इस यात्रा को देश के सर्वोच्च न्यायिक मंच तक पहुंचा दिया।

2023 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच तक पहुंचा रायगढ़ का बेटा

वर्ष 2023 में प्रशांत कुमार मिश्रा ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।

यह उपलब्धि सिर्फ उनके व्यक्तिगत करियर की ऊंचाई नहीं थी। यह रायगढ़ जैसे छोटे शहर के उन हजारों युवाओं के लिए भी प्रेरणा बनी, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।

एक तरफ कभी म्युनिसिपल स्कूल के खाली कमरों में लगने वाली लॉ कॉलेज की कक्षाएं थीं और दूसरी तरफ देश की सर्वोच्च अदालत की बेंच।

दोनों के बीच की दूरी केवल वर्षों की नहीं थी।

यह दूरी थी—मेहनत, अनुशासन, निरंतर सीखने और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ते रहने की।

‘परस भैया’ की कहानी में छिपा बड़ा संदेश

प्रशांत कुमार मिश्रा की यात्रा को करीब से देखने वालों के लिए यह केवल सफलता की कहानी नहीं है। इसमें उन युवाओं के लिए भी संदेश है जिन्हें लगता है कि बड़े सपनों के लिए बड़े शहर, महंगे संस्थान या अत्याधुनिक सुविधाएं अनिवार्य हैं।

उनकी कहानी बताती है कि शुरुआत कैसी है, यह हमेशा आपके नियंत्रण में नहीं होती। लेकिन उस शुरुआत को किस ऊंचाई तक ले जाना है, यह काफी हद तक आपके प्रयास तय करते हैं।

रायगढ़ का वह समय, जब संसाधन सीमित थे; म्युनिसिपल स्कूल के कमरों में लगने वाली कक्षाएं; अंग्रेजी सीखने के लिए बनाया गया छोटा समूह; रायगढ़ से जबलपुर और फिर बिलासपुर की यात्रा—इन सभी पड़ावों ने मिलकर उस व्यक्तित्व को आकार दिया, जो अंततः देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।

आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज जब रायगढ़ के युवा करियर और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े शहरों की ओर देखते हैं, तब प्रशांत कुमार मिश्रा की कहानी उन्हें यह भरोसा देती है कि छोटे शहर से निकला विद्यार्थी भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है।

संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन सीखने की इच्छा कम नहीं होनी चाहिए।

कॉलेज छोटा हो सकता है, लेकिन लक्ष्य छोटा नहीं होना चाहिए।

शुरुआत साधारण हो सकती है, लेकिन मंजिल असाधारण हो सकती है।

यही वजह है कि ‘परस भैया’ की कहानी रायगढ़ के लिए सिर्फ गर्व का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा भी है।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

एक छोटे शहर के सीमित संसाधनों वाले लॉ कॉलेज से शुरू हुआ सफर जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय की बेंच तक पहुंचता है, तो वह अपने पीछे एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ जाता है—

मंजिल तय करने में आपकी शुरुआत से ज्यादा मायने रखता है कि आप रास्ते में कितनी मेहनत करते हैं और कितनी बार खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।

रायगढ़ की मिट्टी से निकली यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक यह याद दिलाती रहेगी कि बड़े सपने देखने के लिए बड़ी जगह जरूरी नहीं होती।

जरूरी होता है—बड़ा हौसला, निरंतर मेहनत और अपनी क्षमता पर विश्वास।

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