लोकतंत्र को बचाना है तो पत्रकार सुरक्षा कानून आवश्यक: रत्नाकर त्रिपाठ

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पत्रकार सुरक्षा को लेकर अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति ने उठाई राष्ट्रीय कानून की मांग

नई दिल्ली। लोकतंत्र में पत्रकारों को अक्सर चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार न केवल घटनाओं और सूचनाओं को जनता तक पहुंचाते हैं, बल्कि सत्ता, प्रशासन, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से जुड़े सवाल भी सार्वजनिक करते हैं। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग को लेकर विशेष कानूनी व्यवस्था की मांग लगातार उठती रही है।

अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष जिग्नेश कलावडिया ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि देश में पत्रकारों के लिए व्यापक और प्रभावी राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता है। समिति का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।

पत्रकारों पर हमले और गिरफ्तारी का मुद्दा

राष्ट्रीय संगठन महासचिव महफूज खान ने फ्री स्पीच कलेक्टिव की ‘फ्री स्पीच इन इंडिया 2025’ रिपोर्ट का हवाला देते हुए पत्रकारों के खिलाफ हमले, उत्पीड़न, धमकी और गिरफ्तारियों का मुद्दा उठाया। हालांकि, इस रिपोर्ट में बताए गए 14,875 मामलों, 33 हमलों और 8 गिरफ्तारियों के आंकड़ों को संबंधित मूल रिपोर्ट से स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए जाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों के सामने खतरा केवल शारीरिक हमलों तक सीमित नहीं है। धमकी, कानूनी कार्रवाई, ऑनलाइन उत्पीड़न और अन्य दबाव भी स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं।

मुकेश चंद्राकर हत्याकांड का दिया उदाहरण

अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सिंह परिहार ने छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या का उल्लेख करते हुए पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाए।

मुकेश चंद्राकर की लाश 3 जनवरी 2025 को बीजापुर में एक सेप्टिक टैंक से बरामद हुई थी। उनकी उम्र को लेकर विभिन्न रिपोर्टों में अंतर रहा है, इसलिए यहां उम्र का उल्लेख नहीं किया जा रहा है। वे बस्तर क्षेत्र में रिपोर्टिंग करते थे और उनकी रिपोर्टिंग में करीब 120 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना में कथित अनियमितताओं का मुद्दा सामने आया था। मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और जांच आगे बढ़ी।

परिहार ने कहा कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों को कई बार स्थानीय प्रभावशाली लोगों, ठेकेदारों और अन्य दबावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पत्रकारों के लिए प्रभावी सुरक्षा तंत्र जरूरी है।

2025 में वैश्विक स्तर पर पत्रकारों की रिकॉर्ड मौतें

कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) के अनुसार 2025 में दुनिया भर में 129 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए, जो CPJ के 1992 से आंकड़े दर्ज करने के बाद सबसे अधिक संख्या थी। CPJ ने 2025 में 47 पत्रकारों की ऐसी हत्याएं भी दर्ज कीं जिन्हें उसने उनके काम से संबंधित लक्षित हत्याओं के रूप में वर्गीकृत किया।

CPJ के आंकड़ों के मुताबिक 1 दिसंबर 2025 तक दुनिया में 335 पत्रकार जेल में थे

भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का भी मुद्दा

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। भारत का स्कोर 31.96 रहा। RSF ने भारत के संदर्भ में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण और राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया है।

समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि यह रैंकिंग किसी एक घटना का मूल्यांकन नहीं है, लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता को संस्थागत स्तर पर मजबूत करने की जरूरत पर बहस जरूर खड़ी करती है।

क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?

पत्रकारों को हत्या, मारपीट, धमकी और अन्य अपराधों से सुरक्षा देने के लिए सामान्य आपराधिक कानून पहले से मौजूद हैं। समिति का सवाल है कि पत्रकारिता के कारण होने वाले हमले या प्रतिशोध से बचाने के लिए क्या विशेष और त्वरित सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय महासचिव रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि किसी पत्रकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे पत्रकारिता के कारण निशाना बनाया गया है। उन्होंने कहा कि वास्तविक अपराध की स्थिति में कानून अपनी सामान्य प्रक्रिया के तहत काम करे, लेकिन पत्रकारिता के पेशेवर कार्य के कारण होने वाले प्रतिशोध से सुरक्षा के लिए अलग व्यवस्था पर विचार होना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में पहले से है पत्रकार सुरक्षा संबंधी कानून

छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष गोविंद शर्मा ने बताया कि राज्य में छत्तीसगढ़ प्रोटेक्शन ऑफ मीडिया पर्सन्स एक्ट, 2023 लागू है। इस कानून का उद्देश्य मीडिया कर्मियों के कर्तव्य निर्वहन के दौरान हिंसा की रोकथाम तथा मीडिया कर्मियों और मीडिया संस्थानों की संपत्ति को नुकसान से सुरक्षा प्रदान करना है।

समिति का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर समान कानून होने से अलग-अलग राज्यों में पत्रकार सुरक्षा की व्यवस्थाओं के बीच अंतर कम किया जा सकता है।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून में इन प्रावधानों की मांग

समिति ने पत्रकार सुरक्षा कानून में कई बिंदुओं पर विचार की आवश्यकता बताई है। इनमें पत्रकार पर हमले की तत्काल जांच, धमकी मिलने पर जोखिम का आकलन, गंभीर मामलों में समयबद्ध जांच और अभियोजन, पत्रकारिता के कारण किए गए हमले को गंभीर परिस्थिति मानना तथा प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा शामिल है।

इसके अलावा डिजिटल युग में ऑनलाइन धमकी, डॉक्सिंग, ट्रोलिंग और साइबर उत्पीड़न से सुरक्षा तथा ग्रामीण, स्वतंत्र, फ्रीलांस और डिजिटल पत्रकारों को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल करने की मांग की गई है।

पत्रकार की सुरक्षा को जनता की सुरक्षा से जोड़ा

अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय प्रताप नारायण सिंह ने कहा कि पत्रकार को मिलने वाली धमकी का प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यदि पत्रकार भ्रष्टाचार, अवैध खनन, सरकारी व्यवस्था, सड़क निर्माण या जनहित के अन्य मुद्दों पर रिपोर्ट करने से डरने लगे, तो इसका असर जनता तक पहुंचने वाली सूचनाओं पर भी पड़ता है।

उन्होंने कहा कि पत्रकार सुरक्षा का सवाल केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह जनता के सूचना के अधिकार, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी जुड़ा है।

कानून पत्रकारों को विशेषाधिकार नहीं, सुरक्षा दे

रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकार सुरक्षा कानून का उद्देश्य पत्रकारों को कानून से ऊपर रखना नहीं होना चाहिए। यदि कोई पत्रकार वास्तविक अपराध करता है तो उसके खिलाफ निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पत्रकारिता के कारण किसी पत्रकार को धमकी, हिंसा या प्रतिशोध का सामना करना पड़े, तो ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

राष्ट्रीय कानून पर गंभीर बहस की मांग

समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक, संतुलित और प्रभावी राष्ट्रीय कानून पर केंद्र स्तर पर गंभीर बहस होनी चाहिए।

रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा, “पत्रकार सुरक्षित होगा, तभी वह बिना भय के सवाल पूछ सकेगा। सवाल पूछे जाएंगे, तभी सत्ता जवाबदेह रहेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा। पत्रकार की सुरक्षा किसी व्यक्ति विशेष की सुरक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सुरक्षा है।”

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