अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
मुश्किल हालात के आगे नहीं झुकी महिला, सड़क किनारे छोटा कारोबार शुरू कर बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च उठा रही अपने दम पर
हालात बदले, लेकिन हौसला नहीं टूटा
जिंदगी में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ता निकाला जा सकता है। ऐसी ही मिसाल पेश कर रही हैं एक जुझारू महिला, जिन्होंने आर्थिक परेशानियों के सामने हार मानने के बजाय अपने हाथों से मेहनत करने का फैसला किया। उन्होंने सड़क किनारे मोमोज का छोटा सा ठेला शुरू किया और धीरे-धीरे इसे अपने परिवार की आजीविका का जरिया बना लिया।
आज उनका यह छोटा कारोबार सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की पहचान बन चुका है।
सुबह 5 बजे से शुरू हो जाती है मेहनत
महिला की दिनचर्या सुबह करीब 5 बजे शुरू हो जाती है। घर के जरूरी काम निपटाने के बाद वह सब्जियों की तैयारी और मोमोज बनाने का काम शुरू करती हैं। इसके बाद ठेला लेकर सड़क किनारे पहुंचती हैं और दोपहर से देर शाम तक ग्राहकों को गरमा-गरम मोमोज परोसती हैं।
दिनभर की इस मेहनत के पीछे उनका सबसे बड़ा उद्देश्य अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखना और परिवार की जरूरतों को पूरा करना है।
बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के खर्च तक जिम्मेदारी
मोमोज के कारोबार से होने वाली आमदनी से वह परिवार के जरूरी खर्चों को पूरा करने में योगदान देती हैं। बच्चों की स्कूल फीस, घर का राशन और दवाइयों जैसे खर्चों में भी इसी कमाई की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उनकी कहानी यह बताती है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए हमेशा बड़े कारोबार या बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती। छोटे स्तर से शुरू किया गया काम भी मेहनत और निरंतरता के साथ परिवार का मजबूत सहारा बन सकता है।
स्वाद और व्यवहार से बनाया ग्राहकों का भरोसा
महिला के ठेले पर आने वाले ग्राहक केवल मोमोज के स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि साफ-सफाई और उनके व्यवहार के कारण भी दोबारा पहुंचते हैं। नियमित ग्राहकों के भरोसे ने उनके छोटे कारोबार को मजबूती दी है।
धीरे-धीरे लोगों के बीच उनकी मेहनत और संघर्ष की चर्चा भी होने लगी है।
शुरुआत में ताने मिले, लेकिन कदम नहीं रुके
महिला के मुताबिक, जब उन्होंने कारोबार शुरू किया तो शुरुआत में कुछ लोगों ने तरह-तरह की बातें भी कीं। सड़क किनारे ठेला लगाकर काम करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने लोगों की बातों को अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
उनका मानना है कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। ईमानदारी से की गई मेहनत ही इंसान की असली पहचान है। मेहनत से कमाई गई रोटी में जो संतोष और सम्मान मिलता है, वह किसी सहारे पर निर्भर रहने से नहीं मिल सकता।
संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक का सफर
आज यह महिला अपने छोटे से कारोबार के जरिए न केवल परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही हैं, बल्कि आसपास की दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं। उनकी कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, मेहनत, आत्मविश्वास और हौसले के साथ नई शुरुआत की जा सकती है।




