कोरोना काल की पोस्टिंग और अटैचमेंट पर उठे गंभीर सवाल, शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली जांच के घेरे में

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अभिषेक कुमार पाण्डेय

रिपोर्टर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

ट्रांसफर, अटैचमेंट और युक्तियुक्तकरण में नियमों के उल्लंघन के आरोप; वर्षों बाद भी कई मामलों के लंबित रहने पर सवाल

रायपुर/बिलासपुर। कोरोना महामारी के दौरान छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में हुए स्थानांतरण, अटैचमेंट और पदस्थापना से जुड़े मामलों को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि महामारी के दौरान सामान्य प्रशासनिक गतिविधियां प्रभावित होने के बावजूद कुछ शिक्षकों को उनकी मूल पदस्थापना से हटाकर सुविधाजनक स्थानों पर अटैच किया गया और कुछ मामलों में नियमों को दरकिनार कर आदेश जारी किए गए।

इन आरोपों की वास्तविकता जांच और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल के बाद ही स्पष्ट हो सकती है, लेकिन वर्षों बाद भी कुछ मामलों के लंबित रहने से विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं।

कोरोना काल में अटैचमेंट और पदस्थापना पर सवाल

शिकायतों और सामने आ रही जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020-21 के दौरान कुछ शिक्षक अपनी मूल पदस्थापना से अलग स्थानों पर कार्यरत रहे। आरोप लगाया जा रहा है कि कोरोना ड्यूटी, प्रशासनिक आवश्यकता या अन्य आधारों का हवाला देकर कई शिक्षकों को जिला मुख्यालय अथवा सुविधाजनक स्थानों पर अटैच किया गया।

शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि इन व्यवस्थाओं के लिए किस स्तर से अनुमति दी गई और क्या संबंधित आदेश तत्कालीन शासन नियमों के अनुरूप थे। यदि किसी मामले में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है।

बैकडेट आदेश और दस्तावेजों की जांच की मांग

मामले में कुछ आदेशों के बैकडेट में जारी होने तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित मूल दस्तावेजों और विभागीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही हो सकती है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि स्थानांतरण, पदस्थापना, अटैचमेंट और युक्तियुक्तकरण से संबंधित सभी आदेशों की समय-सीमा, अनुमोदन और सक्षम अधिकारी की अनुमति की जांच की जानी चाहिए।

वर्षों बाद भी व्यवस्था कायम रहने पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल उन मामलों को लेकर है, जिनमें कोरोना काल के दौरान बनाई गई अस्थायी व्यवस्था लंबे समय तक जारी रहने का आरोप है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, कुछ शिक्षक अपनी मूल पदस्थापना पर लौटने के बजाय वर्षों तक दूसरी जगह कार्यरत रहे।

ऐसे मामलों में यह पता लगाया जाना जरूरी है कि संबंधित शिक्षकों को किस आदेश के आधार पर वर्तमान स्थान पर काम करने की अनुमति मिली और क्या उस आदेश की वैधता समय-समय पर विभागीय स्तर पर जांची गई।

DPI की सख्ती के बाद बढ़ी हलचल

शिकायतकर्ताओं का दावा है कि हाल के समय में लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा अटैचमेंट समाप्त करने और लंबे समय से अनुपस्थित कर्मचारियों के मामलों में कार्रवाई के संकेत दिए गए हैं। इसके बाद पुराने मामलों की समीक्षा को लेकर विभागीय स्तर पर हलचल बढ़ी है।

यदि विभाग इन मामलों की जांच करता है तो कोरोना काल से अब तक जारी किए गए संबंधित आदेशों, सेवा अभिलेखों, उपस्थिति और वेतन भुगतान रिकॉर्ड की भी जांच महत्वपूर्ण होगी।

जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी तस्वीर

इस पूरे मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि कोरोना काल के दौरान जारी किए गए स्थानांतरण और अटैचमेंट आदेशों की निगरानी किस स्तर पर हुई और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ था या तत्कालीन परिस्थितियों में प्रशासनिक आवश्यकता के तहत निर्णय लिए गए थे। दोष सिद्ध होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है।

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