‘नौकरी से निकालोगे भी और वजह भी छिपाओगे? नहीं चलेगा : विभागीय जांच की नोटशीट पर बिलासपुर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार, ‘गोपनीयता’ की आड़ लेने वाले अफ़सरों को झटका

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अभिषेक कुमार पाण्डेय@बिलासपुर: विभागों में अक्सर देखा जाता है कि किसी कर्मचारी को बर्खास्त करने के बाद जब वह अपने ही खिलाफ हुई जांच के कागजात मांगता है, तो अफसर ‘गोपनीयता’ और ‘थर्ड पार्टी प्राइवेसी’ का ढोल पीटने लगते हैं। इसी प्रशासनिक मनमानी और अपारदर्शिता पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में व्यवस्था दी है कि किसी कर्मचारी को अपने ही खिलाफ हुई विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आधार बनी पूरी नोटशीट (दस्तावेज) आरटीआई के जरिए हासिल करने का कानूनी अधिकार है।

जस्टिस ए.के. प्रसाद की सिंगल बेंच ने इस मामले में जनसूचना अधिकारी, प्रथम अपीलीय प्राधिकारी और राज्य सूचना आयोग—तीनों के फैसलों को एक झटके में निरस्त कर दिया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि अपने बचाव के लिए दस्तावेज मांगना मुलाजिम का बुनियादी हक है और इसे आरटीआई कानून के अपवादों के पीछे छिपकर दबाया नहीं जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

जांजगीर-चांपा के फैमिली कोर्ट में अकरम खान ड्राइवर के पद पर पदस्थ थे। कथित कदाचार के सात आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ दो विभागीय जांचें शुरू हुईं और 5 जनवरी 2021 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

अकरम खान का आरोप था कि उन्हें न तो जांच के दौरान निष्पक्ष बचाव का मौका मिला और न ही वे दस्तावेज सौंपे गए जिनके बूते उन पर गाज गिराई गई थी। जब उन्होंने उच्च अधिकारियों के समक्ष अपील करने के लिए आरटीआई के तहत पूरी नोटशीट व जांच रिपोर्ट मांगी, तो सिस्टम ने पूरी ताकत से दरवाजा बंद कर दिया:
* 15 जनवरी 2021: जनसूचना अधिकारी ने आवेदन खारिज किया।
* 10 मार्च 2021: प्रथम अपीलीय अधिकारी ने भी अपील ठुकरा दी।
* 28 जनवरी 2022: राज्य सूचना आयोग ने भी दूसरी अपील निरस्त कर दी।
आयोग तक के इस नकारात्मक रवैये के खिलाफ अकरम खान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट की दो-टूक: ‘निजता का बहाना कानून की मंशा के खिलाफ’
अधिकारियों ने आरटीआई कानून की धारा 8(1)(c) और धारा 8(1)(j) का हवाला देकर कहा था कि यह गोपनीय और व्यक्तिगत जानकारी है। हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा:
 

खुद की जांच, किसी तीसरे की निजता नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने जो जानकारी मांगी है, वह उसकी अपनी ही जांच और सेवा समाप्ति से जुड़ी है। यह न तो किसी बाहरी पक्ष की गोपनीय जानकारी है और न ही इससे किसी की निजता भंग होती है।

बचाव का अधिकार सर्वोपरि: अगर कोई बर्खास्त कर्मचारी अपने खिलाफ लिए गए एक्शन की वैधता को चुनौती देने के लिए दस्तावेज मांग रहा है, तो उसे कानूनी संरक्षण हासिल है। इसे धारा 8(1)(j) का डर दिखाकर दबाना कानून की भावना के साथ खिलवाड़ है।

30 दिन का अल्टीमेटम
हाईकोर्ट ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट के जनसूचना अधिकारी को आदेश दिया है कि निर्धारित शुल्क लेकर याचिकाकर्ता को विभागीय जांच से संबंधित पूरी नोटशीट और दस्तावेज 30 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराए जाएं।
यह फैसला उन तमाम सरकारी महकमों के लिए एक कड़ा संदेश है, जो विभागीय कार्रवाइयों को ‘गोपनीय’ बताकर कर्मचारियों के बचाव के अधिकारों को फाइलों में दफन कर देते हैं।

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