छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में किशोर न्याय पर 11वीं राज्य स्तरीय परामर्श कार्यशाला, बोले- आज बच्चों के साथ व्यवहार ही कल के समाज की नींव रखेगा
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की पॉक्सो एवं किशोर न्याय समिति, राज्य न्यायिक अकादमी और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (सालसा) के संयुक्त आयोजन में किशोर न्याय व्यवस्था को लेकर 11वीं राज्य स्तरीय परामर्श कार्यशाला आयोजित की गई। बिलासपुर के विवेकानंद सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015—एक दशक का क्रियान्वयन एवं आगे की राह’ विषय पर विस्तार से चर्चा हुई।

बालक का सर्वोत्तम हित हो प्राथमिकता
कार्यक्रम का उद्घाटन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय प्रणाली की सफलता केवल मामलों के निपटारे और न्यायिक आदेशों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असली कसौटी यह है कि व्यवस्था के संपर्क में आने वाले हर बच्चे के साथ कितनी संवेदनशीलता, सम्मान, निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाता है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘बालक का सर्वोत्तम हित’ किशोर न्याय व्यवस्था का केंद्रीय सिद्धांत होना चाहिए। उन्होंने दंड देने के बजाय सुधार और पुनर्स्थापन तथा बच्चों को व्यवस्था से अलग करने के बजाय उनके पुनर्वास पर जोर दिया।
समस्याओं की जल्द पहचान और समयबद्ध कार्रवाई जरूरी
न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा कि बच्चों से जुड़ी समस्याओं की पहचान जितनी जल्दी होगी, उतना ही प्रभावी हस्तक्षेप संभव होगा। उन्होंने समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि किशोरों के विकास और उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए न्याय व्यवस्था को संवेदनशील तरीके से काम करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि किशोर न्याय से जुड़ी जिम्मेदारी किसी एक संस्था की नहीं है। न्यायपालिका, पुलिस, किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति और जिला बाल संरक्षण इकाई के बीच बेहतर समन्वय से ही बच्चों को प्रभावी संरक्षण और न्याय मिल सकता है।
न्यायिक अधिकारियों को बाल मनोविज्ञान की समझ जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों से बच्चों की मानसिक और विकासात्मक जरूरतों को समझने की अपेक्षा जताई। उन्होंने कहा कि किशोरों के मामलों में निर्णय लेते समय बाल मनोविज्ञान और उनकी परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
दो तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने रखे विचार
कार्यशाला के दौरान दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों की अध्यक्षता न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने की, जबकि न्यायमूर्ति राकेश मोहन पाण्डेय, न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने सह-अध्यक्ष के रूप में सहभागिता की।
कार्यक्रम में न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल, न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू, न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल और न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की भी उपस्थिति रही।
कई विभागों और संस्थाओं के प्रतिनिधि हुए शामिल
राज्य स्तरीय कार्यशाला में हाईकोर्ट की रजिस्ट्री के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा न्यायिक अकादमी और विधिक सेवा प्राधिकरण के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। बाल संरक्षण आयोग, महिला एवं बाल विकास विभाग, स्कूल शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। इसके साथ यूनिसेफ तथा विभिन्न नागरिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी किशोर न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने को लेकर चर्चा में भाग लिया।
कार्यशाला के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि बच्चों के वर्तमान के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ही भविष्य में एक बेहतर और जिम्मेदार समाज के निर्माण का आधार बन सकता है।




