रायपुर बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में सुरक्षा माहौल में सुधार के साथ आदिवासी संस्कृति की पारंपरिक धरोहर ‘घोटुल’ की रौनक फिर लौटने लगी है। अंदरूनी गांवों में ग्रामीण स्थानीय लकड़ी और प्राकृतिक सामग्री से पारंपरिक घोटुल तैयार कर रहे हैं। यहां बुजुर्ग नई पीढ़ी को समाज की परंपराओं, अनुशासन, लोकगीत, नृत्य और सामुदायिक जीवन से जुड़े दायित्वों की जानकारी दे रहे हैं।
चेलिक-मोटियारिन के लोकगीतों से गूंज रहा अबूझमाड़
अबूझमाड़ की शामों में अब डर और सन्नाटे की जगह मांदर की थाप और ‘चेलिक-मोटियारिन’ के लोकगीत सुनाई देने लगे हैं। नक्सली हिंसा के दौर में शाम होते ही ग्रामीणों के घरों तक सीमित हो जाने से घोटुल की गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के बाद ग्रामीणों में भरोसा बढ़ा है और पारंपरिक सांस्कृतिक गतिविधियां दोबारा शुरू हो रही हैं।
युवाओं के लिए संस्कृति और अनुशासन की पाठशाला
घोटुल आदिवासी समाज के लिए केवल सामूहिक मेल-मिलाप का स्थान नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। युवा यहां बुजुर्गों से पारंपरिक गीत-संगीत, नृत्य और सामाजिक रीति-रिवाज सीख रहे हैं।
सुरक्षा के साथ लौट रही सामान्य जिंदगी
सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ अबूझमाड़ के कई इलाकों में ग्रामीणों की आवाजाही, खेती-किसानी, हाट-बाजार और त्योहारों से जुड़ी गतिविधियों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। घोटुलों का दोबारा सक्रिय होना स्थानीय लोगों के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन से जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर बन रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को स्थायी बनाने के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है। घोटुलों से गूंजती मांदर की थाप अब इस बदलाव का प्रतीक बन रही है कि भय का माहौल कम होने पर पारंपरिक संस्कृति और सामूहिक जीवन फिर से अपनी लय में लौट सकता है।


