अभिषेक कुमार पाण्डेय की खास रिपोर्ट | बिलासपुर, छत्तीसगढ़
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ को आमतौर पर ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन प्रदेश की पहचान केवल धान तक सीमित नहीं है। यहां की पारंपरिक खानपान संस्कृति में शामिल विभिन्न प्रकार की भाजियां भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध जैव विविधता और लोक परंपरा की अनूठी पहचान हैं। गांवों के खेत-खलिहानों, बाड़ियों, तालाबों और जंगलों के आसपास मिलने वाली कई स्थानीय भाजियां पीढ़ियों से छत्तीसगढ़ी थाली का हिस्सा रही हैं।
स्वाद के साथ लोक संस्कृति से जुड़ी परंपरा
छत्तीसगढ़ी खानपान में भाजी सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मौसम के अनुसार मिलने वाली इन भाजियों को ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक तरीके से पकाया जाता है। लहसुन, सूखी लाल मिर्च और सरसों तेल का साधारण तड़का इनके स्वाद को खास बना देता है।
बोहार से कोयलार तक कई स्थानीय भाजियां
छत्तीसगढ़ में बोहार, कोयलार, कर्मता, कांदा, चेंच, चरोटा, खोटनी और कुकरी पोटा जैसी कई स्थानीय भाजियां लोकप्रिय हैं। इनमें से कुछ जंगलों या प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधों से प्राप्त होती हैं, जबकि कई भाजियां खेतों और बाड़ियों में उगाई जाती हैं।
इनका उपयोग केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि पारंपरिक खानपान और स्थानीय ज्ञान-परंपरा के हिस्से के रूप में भी किया जाता रहा है। हालांकि किसी भाजी को किसी बीमारी की ‘रामबाण दवा’ बताने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण और विशेषज्ञों की सलाह जरूरी है।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख पारंपरिक भाजियां
छत्तीसगढ़ की स्थानीय परंपरा में प्रचलित भाजियों में मुनगा भाजी, लाल भाजी, मुरई भाजी, गोभी भाजी, सरसों भाजी, बोहार भाजी, करेला भाजी, पालक भाजी, तीवरा भाजी, कोयलार भाजी, करमता भाजी, सुनसुनिया भाजी, भथुआ भाजी, मेथी भाजी, कांदा भाजी, पोई भाजी, चेंच भाजी, कोचई भाजी, खोटनी भाजी, गोदली भाजी, खेड़ा भाजी, गुमी भाजी, मुडही भाजी, चरोटा भाजी, बंधे भाजी, केना भाजी, चना भाजी, मस्टर भाजी, गजकुरना भाजी, पीपर भाजी, मखना भाजी, नोनिया भाजी, हमारी भाजी, चनौरी भाजी, चांटी भाजी, कोसम भाजी, सिलयारी भाजी, कुकरी पोटा भाजी, बरबटी भाजी, चौलाई भाजी, कुदरू भाजी, मिर्ची भाजी, मुस्केनी भाजी, कोजयारी भाजी, दांत खिसोरी भाजी और उरला भाजी शामिल हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके स्थानीय नाम और उपलब्धता में अंतर भी देखने को मिलता है।
भात, बासी और पेज के साथ बढ़ जाता है स्वाद
गर्म भात के साथ भाजी हो या फिर बासी और पेज के साथ पारंपरिक भाजी—छत्तीसगढ़ी भोजन का स्वाद इन व्यंजनों के बिना अधूरा माना जाता है। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण अंचलों में मौसमी भाजियों की मांग बनी हुई है।
जैव विविधता और स्थानीय पहचान का हिस्सा
आज दुनिया प्राकृतिक और स्थानीय खाद्य पदार्थों की ओर दोबारा आकर्षित हो रही है। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक भाजियां प्रदेश की जैव विविधता, स्थानीय कृषि और खानपान की समृद्ध परंपरा को सामने लाती हैं। इन स्थानीय खाद्य परंपराओं का संरक्षण नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
‘छत्तीसगढ़ की शान, भाजी हमारी पहचान’ केवल एक कहावत नहीं, बल्कि प्रदेश की उस भोजन संस्कृति की झलक है, जिसमें स्वाद के साथ मिट्टी, मौसम और परंपरा का गहरा रिश्ता जुड़ा हुआ है।


