आजादी के 78 साल बाद भी नहीं बदली पसान-मातिन क्षेत्र की तस्वीर
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले से लगे पसान-मातिन क्षेत्र के गांव आज भी विकास की किरणों से कोसों दूर हैं। पुल-पुलियों के अभाव में पसान तहसील के अनेक गांव बरसात में पहुंचविहीन हो जाते हैं। ग्रामीणों को अपने तहसील मुख्यालय पसान और विकासखंड मुख्यालय पोड़ी-उपरोड़ा जाने के लिए गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। बीमार होने पर यह तकलीफ नारकीय पीड़ा में बदल जाती है।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन को 26 साल और देश की स्वतंत्रता को 79 साल होने जा रहे हैं, फिर भी कोरबा जिले के इस सीमांत क्षेत्र के गांवों में विकास नहीं पहुंचा। बरसात में नदियां उफान पर रहती हैं और जनजीवन ठहर सा जाता है।
पंडरीपानी, बाघिनडांड, बहरीझोरकी, सारिसमार, सैला-सेमरा सहित अनेक गांव बम्हनी नदी में पुल न होने से तहसील मुख्यालय से कटे हुए हैं। पंडरीपानी से नदी तक का 2 किलोमीटर कच्चा रास्ता पहाड़ से आए पानी के कारण कट चुका है और कीचड़ में बदल गया है। इसी कीचड़ भरे रास्ते से ग्रामीण मरीजों को कमर भर पानी वाली नदी पार कराकर अस्पताल ले जाने को मजबूर हैं।
हाई स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इसी नदी को पार कर 10 किमी साइकिल चलाकर पसान पढ़ने जाते थे, लेकिन बरसात में जान जोखिम में डालकर नदी पार करना मुश्किल है, इसलिए बच्चे अवकाश पर हैं। वैकल्पिक मार्ग पंडरीपानी से अजगरडांड-ओड़ेझरिया होते हुए तिलोरा ग्राम पंचायत (GPM जिला) होकर जाता है, जिसकी दूरी 18-20 किमी है। उस मार्ग में भी 3 किमी चिकनी मिट्टी वाली सड़क बेहद खराब है। कई बच्चों ने पसान में किराये का कमरा ले लिया है, तो कई ने सकोला (GPM) के स्कूलों में प्रवेश ले लिया है।
गांव की अजीब स्थिति यह है कि ग्राम बहरीझोरकी के दो मोहल्ले गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में और दो मोहल्ले कोरबा जिले में आते हैं, वह भी 4 अलग-अलग ग्राम पंचायतों में बंटे हुए हैं।
पसान-मातिन के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार की सारी निर्भरता गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले पर है। GPM जिला मुख्यालय नजदीक है, जबकि कोरबा मुख्यालय बहुत दूर है। इसलिए पूरा पसान तहसील GPM में शामिल होने की मांग कर रहा है। कांग्रेस सरकार और बाद में भाजपा प्रत्याशी सरोज पांडे ने भी आश्वासन दिया था, लेकिन राजनीतिक कारणों से निर्णय नहीं हो सका।
इस क्षेत्र में कहावत प्रचलित है – “जहर पिए ना माहुर खाए, मरे के होय तो मातिन जाए।” कभी बाघ-हाथी वाला यह बीहड़ जंगल आज भी सड़क और पुल के इंतजार में है।
ग्राम पंचायत पंडरीपानी के सरपंच राजू सिंह ओट्टी ने बताया, “हम आवेदन देते-देते थक चुके हैं। पूरी फाइल, प्रस्ताव, एस्टीमेट सब लोक निर्माण विभाग और सेतु निगम में लंबित है। हम मांग कर रहे हैं कि बम्हनी नदी पर पुल बना दिया जाए और तिलोरा-अतरौटीडांड मार्ग के 2800 मीटर हिस्से को सीसी रोड बना दिया जाए, ताकि कम से कम लंबी दूरी तय कर मुख्यालय पहुंच सकें। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।”
उन्होंने कहा कि यह राजनीतिक मामला है, पर सच यही है कि हमारे गांवों की हर जरूरत GPM से ही पूरी होती है।


