रायपुर। पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज हो रहे मामलों की बढ़ती संख्या के बीच अधिवक्ता डी.पी. जोशी ने कहा है कि बच्चों की सुरक्षा केवल कठोर कानूनों के भरोसे सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए परिवार, समाज, विद्यालय, पुलिस, न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी निभाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में पॉक्सो मामलों की संख्या में वृद्धि को केवल अपराध बढ़ने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह लोगों में बढ़ती कानूनी जागरूकता और पीड़ितों के सामने आने के साहस का भी संकेत है। उनके अनुसार, भारतीय संविधान, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) तथा पॉक्सो अधिनियम प्रत्येक बच्चे को गरिमा, सुरक्षा और भयमुक्त बचपन का अधिकार प्रदान करते हैं।
अधिवक्ता जोशी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करते हुए पीड़ित-अनुकूल न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष, वैज्ञानिक और संवेदनशील जांच होना आवश्यक है, ताकि पीड़ित को न्याय मिले और न्यायिक प्रक्रिया भी संतुलित बनी रहे।
उन्होंने डिजिटल युग में साइबर ग्रूमिंग, ऑनलाइन शोषण, फर्जी पहचान, सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित अपराधों को बच्चों की सुरक्षा के लिए नई चुनौती बताते हुए कहा कि अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर सतर्क निगरानी रखनी चाहिए। साथ ही विद्यालयों में साइबर सुरक्षा, जीवन कौशल, लैंगिक संवेदनशीलता और कानूनी साक्षरता पर नियमित प्रशिक्षण आयोजित किए जाने चाहिए।
डी.पी. जोशी ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा की सबसे मजबूत कड़ी परिवार है। यदि माता-पिता बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण संवाद बनाए रखें और ऐसा माहौल दें, जहां बच्चा बिना भय के अपनी बात रख सके, तो कई संभावित अपराधों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा कि समाज को यह समझना होगा कि बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार, पुलिस या न्यायालय की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षक, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएं, मीडिया और प्रत्येक नागरिक की इसमें समान भागीदारी है। जन-जागरूकता, कानूनी साक्षरता और विद्यालय आधारित बाल संरक्षण व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि सुरक्षित बचपन ही सशक्त भारत की नींव है। पॉक्सो कानून की सफलता केवल मामलों की संख्या या दोषसिद्धि दर से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि समाज बच्चों को कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध करा पाता है।


